उस दौर में जबकि भारत में खेल भ्र्ष्टाचार अपनी जड़ें जमा रहा था, भारतीय ओलंपिक समिति और खेल संघो के पदाधिकारी अपनी अपनी रोटियां सेंक रहे थे और खिलाड़ियों को अपने स्वार्थो के लिए इस्तेमाल कर रहे थे, राजा रणधीर सिँह अकेले ऐसी हस्ती थे जिसने ना सिर्फ खिलाड़ियों के हितों के लिए हरसंभव प्रयास किया, उनके मनोबल को ऊंचाई तक भी पहुँचाया l देश का हर छोटा बड़ा खिलाड़ी उनसे परिचित था l इसलिए क्योंकि राजा खानदान से होते भी उन्होंने फ़कीर की तरह मिलनसार व्यवहार को आखिर तक बनाए रखा l उनके लिए बड़े – छोटे सभी खिलाड़ी समान थे l सच तो यह है कि वे खिलाड़ियों के सच्चे दोस्त थे और उनकी हर छोटी बड़ी समस्या के समाधान के लिए हर संभव प्रयास करते थे l यही कारण है कि देश के खिलाड़ी उन्हें पिता तुल्य मानते थे l
पत्रकारों के परम मित्र : भारतीय खेल पत्रकारों के साथ उनके सम्बन्ध कैसे थे उस दौर के किसी भी बड़े छोटे पत्रकार से पूछेंगे तो हर एक के पास उनसे जुडी कई कहानियां हो सकती हैं l ऐसी ही एक कहानी का जिक्र कर उनके बड़प्पन को दर्शाने का प्रयास करना चाहता हूँ l “हुआ यूँ कि राजा साहब को साल छह महीने में पत्रकारों को अपने महरौली स्थित फार्म हाउस में बुलाने, खिलाने- पिलाने और बतियाने का शौक था l इसमें दो राय नहीं कि उनका निमंत्रण पाने वालों में हिंदी के खेल पत्रकारों की संख्या बड़ी होती थी, जिनमें स्वर्गीय सुशील जैन, स्व रोशन सेठी, मनोज चतुर्वेदी, स्व सुरेश कौशिक, कुलदीप राठौर, सतेंद्र पाल सिँह, राकेश थपलियाल, विजय कुमार आदि नाम शामिल हैं l 1990 के दशक की एक प्रेस कॉन्फ्रेस की लिए उनका बुलावा आया l कॉन्फ्रेंस शुरू होने से पहले उन्होंने मुझे इशारे से बुलाया, कंधे पर हाथ रखा और चार छह पत्रकारों को साथ लेकर अपने विशाल म्यूजियम में ले गए, जहाँ ढेरों, ट्रॉफी, अवार्ड, मेडल अख़बारों की कटिंग सुशोभित थीं l फिर बीचों बीच उनके कार्टून की साथ छपी पंजाब केसरी की एक ताज़ा कटिंग (क्लीन बोल्ड कॉलम ) की तरफ इशारा किया और पत्रकार मित्रों को सम्बोधित करते हुए बोले,”आपको पता चल गया होगा कि यह किस बदमाश ने लिखा है l ”
बेशक़, राजा साहब एशियाई खेलों का स्वर्ण पदक जीते लेकिन सात ओलिंपिक खेल कर भी खाता नहीं खोल पाए थे, जिसे लेकर मजाकिया अंदाज में कटाक्ष किया गया था l लेकिन उन्होंने मेरे कटाक्ष को हंसी में लिया और तारीफ भी की, जोकि एक सच्चा खिलाड़ी और दिल का राजा ही कर सकता है l अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति का उच्च पद पाने के बावज़ूद जीवन भर विनम्र बने रहे l हर एक का गले मिलकर अभिवादन करना उनके चरित्र में शुमार रहा l बेशक, वह भारतीय खेल इतिहास के सबसे बड़े चैंपियन, सर्व प्रिय और यारों के यार थे l आप हमेशा अमर रहेंगे महाराजा साहब!
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Rajender Sajwan, Senior, Sports Journalist |
