पिछले कुछ सालों से भारत खेल महाशक्ति बनने के लिए जी तोड़ प्रयास कम लेकिन बयानबाजी ज्यादा कर रहा है l अक्सर हमारे नेता सांसद और खेल आका भी दावा करते मिल जाएंगे कि हमारे खिलाड़ी जल्दी ही चैंपियन देशों की कतार में शामिल होने जा रहे हैं l लेकिन कुछ आलोचक चुटकी लेते हुए कह डालते हैं कि सरकार, उसका खेल मंत्रालय, खेल प्राधिकरण और खेल संघो के हाथ शायद कोई जादू की छड़ी लग गई है जिसे घुमाते ही ओलिंपिक और विश्व स्तरीय मुकाबलों में पदक झड़ने लगेंगे l लेकिन कटु सत्य यह है कि हॉकी, कुश्ती, मुक्केबाजी, वेट लिफ्टिंग, बैडमिंटन और निशानेबाजी के चंद झुनझुनों के दम पर हम खेलों में सुपर पावर नहीं बन पाएंगेl जरुरत इस बात की है कि तमाम ओलंपिक खेलों में हम पहले से बहुत बेहतर तो करें, साथ ही उन खेलों में भी पदक जीतें जिनमे अधिकाधिक पदक दाव पर रहते हैं l
यह सही है कि अपना देश कभी हॉकी का बेताज बादशाह था लेकिन अन्य टीम खेलों में कामयाबी नहीं मिल पाई l दूसरी तरफ दुनिया के अग्रणी खेल राष्ट्र विभिन्न खेलों में अपना एकाधिकार बनाए हुए हैं लेकिन ओलिंपिक पदक तालिका में सम्मानजनक स्थान वही बना पाते हैं जिनके पास चैंपियन तैराक, जिम्नास्ट और एथलीट हैं l कारण, इन खेलों में अधिकाधिक पदक दाँव पर रहते हैं l सम्भवतया यही खेल हैं जोकि ओलंपिक और अन्य बड़े आयोजनों में शीर्ष स्थान का निर्धारण करते हैं l ओलिंपिक पदक तालिका पर सरसरी नज़र डालें तो पहले दस स्थान पर वही देश जमे बैठे हैं जिनके पास रिकार्ड तोड़ प्रदर्शन करने वाले एथलीट हैं, जिनके जिम्नास्ट अव्वल दर्जे के हैं और जिनके तैराक स्वीमिंग पूल में आग लगा देने का माद्दा रखते हैं l
अमेरिका, चीन, रूस ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंण्ड, फ़्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, कोरिया, रोमानिया जैसे देश इसलिए अधिकाधिक पदक जीत ले जाते हैं क्योंकि एथलेटिक, तेराकी और जिम्नास्टिक में उनके खिलाड़ी रिकार्ड तोड़ प्रदर्शन के लिए विख्यात हैं l उसैन बोल्ट, कार्ल लूईस, किपचोके, पाओ नूर्मी, जैकी जायनर, सर्गेई बुबका जैसे एथलीट, माइकल फेलप्स, इयान थोर्प, मार्क स्पिटज से महान तैराक और नाडिया कोमनेची जैसी जिम्नास्टों ने ओलम्पिक खेलों और अन्य विश्व स्तरीय आयोजनों में अपने शानदार प्रदर्शन से पदक तालिका में हड़कंप मचा दिया l अर्थात जो देश तैराकी, एथलेटिक और जिम्नास्टिक में अव्वल हैं वही श्रेष्ठ कहलाते आए हैं l दुर्भाग्यवश, भारत इन तीनों ही खेलों में 2020 तक खाली हाथ था l भला हो नीरज चोपड़ा का जिसने 2020 के टोक्यो ओलंपिक में जेवलिन थ्रो का स्वर्ण जीत कर भारत का खाता खोला, जिसके दम पर हम पदक तालिका में सम्मानजनक स्थान पा सके l चार साल बाद नीरज ने पेरिस में सिल्वर मेडल जीत कर भारतीय एथलेटिक का गौरव बढ़ाया l पिछले सौ सालों में बस यही भारतीय एथलेटिक की कमाई रही है l लेकिन जिम्नास्टिक और तेराकी में गहराई तक डूबे हुए हैं और कोई चमत्कार ही भारत की नैया पार लगा सकता है l
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Rajender Sajwan, Senior, Sports Journalist |
