भारतीय राष्ट्रीय जूनियर हॉकी टीम के कोच पी आर श्रीजेश को अपदस्त किए जाने के बाद भारतीय हॉकी में अपने किस्म का नया विवाद शुरू हो गया है l हालांकि श्रीजेश का कार्यकाल ठीक ठाक रहा और उनके काम काज की खुद हॉकी इंडिया द्वारा समय समय पर प्रशंसा भी की गई लेकिन उन्हें हटाए जाने पर हॉकी हलकों में बयानबाजी शुरू हो गई है, जिसको लेकर गुटबाजी और आरोप प्रत्यारोपों का नया सिलसिला शुरू हो सकता है l
फिलहाल श्रीजेश ने आरोप लगाया है कि विदेशी कोच की नियुक्ति की सम्भावना के चलते मुझे बलि का बकरा बनाया गया हैl जवाब में हॉकी इंडिया के अध्यक्ष दिलीप टिर्की पूछ रहे हैँ कि उन्हें कैसे पता कि उनके स्थान पर विदेशी नियुक्त किया जा रहा है?
पिछले कुछ सालों में भारतीय हॉकी ने गैरहर्ड रॉक, टेरी वालश, रोलांट ओलत्मन्स, ग्राहम् रीड, क्रेग फुल्टन आदि विदेशी कोचों को आजमाया l उन पर लाखों करोड़ों खर्च किए गए लेकिन सच्चाई यह है कि एक भी विदेशी भारतीय हॉकी को पटरी पर लाने में सफल नहीं हो पाया l भाले ही ग्राहम् रीड और ग्रेग फुल्टन के कोच रहते भारतीय हॉकी 2024 और 2028 के ओलम्पिक में काँस्य पदक जीते लेकिन आज भी यह दावे के साथ नहीं कहा जा सकता कि विदेशी ही भारतीय हॉकी की नैया पार लगा सकते हैँ l यह ना भूलें कि भारत द्वारा ओलम्पिक और वर्ल्ड कप में जीते गए तमाम पदक हमारे अपने कोचों की मेहनत, समर्पण और ईमानदारी का पुरस्कार रहे हैँ l तो फिर फेडरेशन और हॉकी इंडिया को विदेशी का मोह क्यों कर है? क्यों बार बार विदेशी कोचों को बढ़ावा दिया जाता है?
गए सालों में कई भारतीय कोचों ने आरोप लगाए कि अपनों को दरकिनार कर गोरी चमड़ी वालों की तीमारदारी आम भारतीय चरित्र बन गया है, जिसका हॉकी इंडिया बराबर अनुसरण करती आई है l इसलिए क्योंकि कुछ अधिकारियों के हित जुड़े होते हैँ, जिनमे सरकारी पक्ष भी भागीदार होता है l कुछ भारतीय कोच तो यहाँ तक कहते पाए गए हैं कि विदेशी की नियुक्ति में जिम्मेदार इकाइयों की हिस्सेदारी तय होती है l श्रीजेश अकेले नहीं जोकि सिस्टम के शिकार हुए हैं l पहले भी कई एक को बेवजह हटाया जाता रहा है l
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Rajender Sajwan, Senior, Sports Journalist |
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