वर्ल्ड कप में भारतीय हॉकी टीमों के शर्मनाक (नहीं दर्दनाक) प्रदर्शन के बाद जाँच पड़ताल का नाटक शुरू हो गया है l हॉकी इंडिया, मंत्रालय, साई, देश के तथाकथित हॉकी एक्सपर्टस, अज्ञानी और बड़बोले खेल पत्रकार और निर्लज सोशल मीडिया के बकबकिया अपने अपने ज्ञान के स्तर पर हार के कारणों की जांच पड़ताल का नाटक रच रहे हैँ l अपने अपने बौद्धिक स्तर के हिसाब से उलूल जुलूल बक रहे हैँ l लेकिन समस्या की तह तक कोई नहीं पहुँच पा रहा l
बेशक़, महिला और पुरुष दोनों टीमें खूब खेली l ऐसा खेलीं जैसा पिछले कई दशकों से खेलती आ रही हैँ या उससे कुछ बेहतर l लेकिन ड्रा खेलना , कम गोल खाना, डटकर मुकाबला करना जैसे सम्बोधनों से हम अपनी हॉकी को कब तक और क्यों बचाते रहेंगे? 51 साल से वर्ल्ड कप नहीं जीत पाए तो ओलंपिक ख़िताब जीते भी 42 साल हो गए हैँ l अब तो ऐसा लगने लगा है कि भारत कभी हॉकी का बेताज बादशाह था भी या नहीं! आज की पीढ़ी तो यहाँ तक कहने लगी है कि हमारी हॉकी का स्वर्णिम इतिहास दंत कथाओं पर टिका है, जिसमें झूठ ज्यादा है l लेकिन हमारी पीढ़ी ने उन महान खिलाडियों को खेलते देखा है, जिनके दम पर बड़े बड़े शूरमाओं ने भारतीय हॉकी को सलाम किया, सर झुकाया और तालियां बजाई l दुर्भाग्य इस देश का जिसके भ्रष्ट हॉकी आकाओं ने अपने अघोषित राष्ट्रीय खेल को बर्बाद कर दिया l
बेशक़, हर हार पर, शर्मनाक प्रदर्शन पर अलग अलग चीर फाड़ होती है लेकिन सच्चाई यह है कि भारतीय हॉकी ने समर्पित, गुणवान और हॉकी कला के महान खिलाड़ी पैदा करना बंद कर दिया है l यह देश इस लिए शर्मसार है क्योंकि सालों से हमने कोई दूसरा ध्यानचंद पैदा नहीं किया l रूप सिँह, के डी सिँह बाबू, जेंटल, बलबीर सिँह सीनियर, शंकर लक्ष्मण, पृथिपाल, अजीतपाल सिँह, अशोक ध्यानचंद, असलम शेरखान, सुरजीत सिँह, मोहम्मद शाहिद जैसे दर्जनों महान खिलाड़ी पैदा करने वाली फैक्ट्री का दीवाला निकल गया है, ताले जड़ गए हैँ l भले ही महिला हॉकी वर्ल्ड कप और ओलंपिक में पदक नहीं दिला पाई लेकिन राजबीर कौर राय, सीता गोसाईं, प्रीतम ठाकरान और ममता ख़रब जैसी खिलाड़ी अब दिखाई नहीं देतीं l ऐसा लगता है कि पिछले कई दशकों से भारतीय हॉकी ने प्रतिभा के धनी, हॉकी कला के माहिर खिलाड़ी पैदा करना बंद कर दिया है, जिसका नतीजा सामने है l इसलिए अब हम पांचवे से आठवें स्थान को संतोषजनक मानने लगे हैं l
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Rajender Sajwan, Senior, Sports Journalist |
