पिछले सप्ताह हरियाणा के एक पूर्व पहलवान और जाने माने कोच ने सुबह – सुबह फोन किया और सम्बोधन के साथ बोले ‘जय हरियाणा – जय भारत’, पता चला कि कुश्ती में हरियाणा ने एक ऐसा रिकार्ड कायम किया है, जैसा कि अब तक किसी भी खेल में कोई अन्य प्रदेश नहीं करं पाया था l
कुछ दशक पहले तक भारतीय कुश्ती दिल्ली के अखाड़ों के इर्द-गिर्द घूमती थी। गुरु हनुमान बिड़ला व्यायामशाला, मास्टर चन्दगीराम अखाड़ा, कैप्टन चाँदरूप अखाड़ा, खलीफा जसराम और बद्री अखाड़ा देश के पहलवानों के कारखाने माने जाते थे। ओलंपिक, एशियाड, कॉमनवेल्थ और विश्व स्तर पर भारत को मान-सम्मान और पदक दिलाने वाले अनेक पहलवान इन्हीं अखाड़ों की देन रहे।लेकिन पिछले कुछ सालों में भारतीय कुश्ती ने करवट बदली है। आगामी एशियाई खेलों के लिए चुनी गई भारतीय कुश्ती टीम इस बदलाव का सबसे बड़ा प्रमाण है। टीम के सभी 18 पहलवान हरियाणवी मूल के हैं या हरियाणा से जुड़े हुए हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो भारतीय कुश्ती राजधानी के धूल-धक्कड़ और पारंपरिक अखाड़ों से निकलकर हरियाणा के गांवों, चौपालों और देहाती अखाड़ों में सिमट गई है और वहीं से संचालित होने लगी है।
महिला कुश्ती की शुरुआत का श्रेय भले ही दिल्ली के महान पहलवान और गुरु श्रेष्ठ मास्टर चन्दगीराम को जाता हो, जिन्होंने सामाजिक रूढ़ियों को चुनौती देते हुए अपनी बेटियों को अखाड़े में उतारा, लेकिन इस आंदोलन को जन-जन तक पहुंचाने का कार्य हरियाणा ने किया। जिस साहस के साथ हरियाणा के माता-पिताओं ने बेटों के साथ बेटियों को भी दंगल के मैदान में उतारा, उसने भारतीय महिला कुश्ती की तस्वीर ही बदल दी।
यह बदलाव विशेष रूप से तब तेज हुआ जब द्रोणाचार्य महावीर फोगाट ने अपनी बेटियों गीता, बबीता और संगीता के साथ-साथ अपनी भतीजी विनेश फोगाट को अखाड़े में उतारने का साहस दिखाया । फोगाट परिवार ने भारतीय महिला कुश्ती को एक नए और क्रांतिकारी दौर में प्रवेश दिलाया। नतीजन आज देश की हजारों लड़कियां पहलवानी को करियर के रूप में अपनाने का साहस जुटा रही हैं तो उसके पीछे फोगाट परिवार की प्रेरणा और समर्पण भी एक बड़ा कारण है।विशेष रूप से विनेश फोगाट का योगदान अलग पहचान रखता है। उन्होंने विश्व स्तर पर भारत का नाम रोशन किया, अनेक अंतरराष्ट्रीय पदक जीते, महिला पहलवानों की आवाज़ को बुलंद किया और पुरुष-प्रधान खेल व्यवस्था से भी टकराने का साहस दिखाया।
भले ही ओलंपिक पदक उनसे बेहद नजदीक आकर छिटक गया, लेकिन इससे उनके संघर्ष और उपलब्धियों का महत्व कम नहीं होता। भविष्य में जब भारतीय कुश्ती का इतिहास लिखा जाएगा, तो विनेश फोगाट का नाम एक साहसी, संघर्षशील और परिवर्तनकारी और क्रन्तिकारी महिला पहलवान के रूप में अवश्य दर्ज होगा।साक्षी मलिक भारत की पहली और अब तक की एकमात्र महिला ओलंपिक पदक विजेता पहलवान हैं, लेकिन हरियाणा की नई पीढ़ी की अनेक लड़कियों के लिए प्रेरणा का चेहरा विनेश फोगाट बनीं। उन्हें देखकर और उनका संघर्ष जानकर अनेक बेटियों ने घूंघट और सामाजिक बंधनों से बाहर निकलकर अखाड़े का रास्ता चुना तथा देश और प्रदेश का नाम रोशन किया। भले ही कुछ पहलवान विनेश को पसंद ना करें लेकिन सही मायने में हरियाणा की वीर बालाओं की प्रेरणा विनेश ही है l
आगामी एशियाई खेलों के लिए चुनी गई महिला फ्रीस्टाइल टीम में दीपांशी, अंतिम पंघाल, मनीषा भानवाला, मानसी अहलावत, निशा दहिया और प्रिया मलिक ने अपने-अपने भार वर्ग में श्रेष्ठता साबित करते हुए स्थान बनाया है। वहीं पुरुष फ्रीस्टाइल और ग्रीको-रोमन वर्ग के सभी 12 पहलवान भी हरियाणा से हैं। अर्थात हरियाणा से है भारतीय कुश्ती l इसलिए जय हरियाणा जय भारत का नारा मायने रखता है l.यह स्थिति केवल एक राज्य के वर्चस्व की कहानी नहीं है, बल्कि उस खेल संस्कृति की सफलता का प्रमाण है जिसने गांवों से विश्वस्तरीय खिलाड़ी तैयार किए। आज भारतीय कुश्ती की सबसे बड़ी जिम्मेदारी हरियाणा के कंधों पर है। कभी भारतीय कुश्ती का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा हरियाणा अब स्वयं “मिनी भारत” बनकर भारतीय कुश्ती की पहचान का पर्याय बन चुका है। आने वाले एशियाई खेलों में देश को पदकों की सबसे बड़ी उम्मीद भी इन्हीं पहलवानों से होगी।
लेकिन भारतीय कुश्ती में एक प्रदेश का एकाधिकार कुछ लोगों के गले नहीं उतर पा रहा l तर्क दिया जा रहा है कि बाकी प्रदेश क्या कर रहे हैं? वहां अच्छे पहलवान् क्यों नहीं निकल पा रहे? यह भी पूछा जा रहा है कि दिल्ली, पंजाब, महाराष्ट्र, उत्तरप्रदेश के पहलवानों को क्या हो गया है? देखा जाए तो एक राज्य का एकाधिकार भी किसी मायने में ठीक नहीं है l उन्हें हरियाणा से सीखने और सबक लेने की जरुरत है l.
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Rajender Sajwan, Senior, Sports Journalist |
