ज्योतिष शास्त्र और पौराणिक मान्यताओं में भगवान शनिदेव का नाम आते ही अक्सर लोग डर और शंका से भर जाते हैं। ज्यादातर लोगों को लगता है कि शनिदेव केवल कष्ट, बाधाएं और परेशानियां ही लाते हैं। लेकिन गहराई से समझें तो शनिदेव कोई क्रूर या नुकसान पहुंचाने वाले देवता नहीं हैं, बल्कि वे ब्रह्मांड के सर्वोच्च न्यायाधीश यानी जज हैं। जैसे किसी अदालत में जज बिना किसी भेदभाव के सबूतों के आधार पर फैसला सुनाता है, ठीक वैसे ही शनिदेव हर इंसान को उसके कर्मों के हिसाब से बिल्कुल सही और निष्पक्ष फल देते हैं। इसी वजह से उन्हें नवग्रहों में ‘न्यायाधीश’ की उपाधि दी गई है।
भगवान शिव से मिला था ब्रह्मांड का न्यायाधीश बनने का वरदान
पौराणिक कथाओं के अनुसार, शनिदेव भगवान सूर्य और माता छाया के पुत्र हैं। बचपन से ही शनिदेव अत्यंत तपस्वी और न्यायप्रिय स्वभाव के थे। उन्होंने भगवान शिव की कठिन तपस्या करके उन्हें प्रसन्न किया था। उनकी निष्ठा, तपस्या और निष्पक्षता से प्रभावित होकर महादेव ने उन्हें नवग्रहों में सबसे ऊंचा और महत्वपूर्ण स्थान दिया। भगवान शिव ने ही शनिदेव को संपूर्ण सृष्टि के प्राणियों के कर्मों का फल देने और दंड देने का अधिकार सौंपा था। तब से शनिदेव को ईश्वर की अदालत का मुख्य न्यायाधीश माना जाने लगा।
कर्मों के आधार पर मिलता है फल, किसी के साथ नहीं होता भेदभाव
शनिदेव की न्यायप्रणाली की सबसे बड़ी खासियत यह है कि उनकी नज़र में राजा और रंक, अमीर और गरीब सब बराबर हैं। वे इंसान के मन, वचन और कर्म तीनों का बारीकी से हिसाब रखते हैं। यदि कोई व्यक्ति ईमानदारी से काम करता है, असहायों की मदद करता है, अपने माता-पिता और बड़ों का सम्मान करता है, तो शनिदेव उस पर अपनी असीम कृपा बरसाते हैं। ऐसे लोगों को उनकी ढैय्या या साढ़ेसाती के दौरान भी कोई बड़ा कष्ट नहीं झेलना पड़ता, बल्कि वे तरक्की की ऊंचाइयों तक पहुंचते हैं।
इसके विपरीत, जो लोग छल-कपट करते हैं, कमजोरों को सताते हैं, रिश्वतखोरी या बेईमानी से धन कमाते हैं, उन्हें शनिदेव समय आने पर कठोर दंड देते हैं। शनि का यह दंड इंसान को सुधारने और उसके अहंकार को तोड़ने के लिए होता है।
धीमी चाल और साढ़ेसाती का असली मकसद
शनिदेव सभी नवग्रहों में सबसे धीमी गति से चलने वाले ग्रह माने जाते हैं। वे एक राशि में लगभग ढाई साल तक रहते हैं। इसी वजह से उनकी साढ़ेसाती साढ़े सात साल और ढैय्या ढाई साल तक चलती है। इस लंबे समय का मुख्य उद्देश्य इंसान को जीवन के सच्चे सबक सिखाना होता है। साढ़ेसाती के दौरान इंसान अपने असली और नकली रिश्तों की पहचान करता है, उसमें धैर्य आता है और उसका अहंकार समाप्त होता है। यह एक तरह से इंसान की आत्म-शुद्धि का दौर होता है, जिससे तपकर वह और अधिक समझदार तथा मजबूत इंसान बनता है।
शनिदेव की कृपा पाने के आसान और सच्चे उपाय
शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए किसी बड़े पाखंड या बहुत ज्यादा पैसों की जरूरत नहीं होती। चूँकि वे न्यायप्रिय हैं, इसलिए सही कर्म ही उनकी सबसे बड़ी पूजा है। असहाय, गरीब, मजदूर और दिव्यांग लोगों की सेवा व मदद करने से शनिदेव बहुत जल्द प्रसन्न होते हैं। शनिवार के दिन पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाना, काले चने या उड़द की दाल का दान करना और अपने आचरण को सात्विक व ईमानदार बनाए रखना ही शनिदेव के प्रकोप से बचने और उनकी कृपा पाने का सबसे असरदार तरीका है।
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