नई दिल्ली: जन्माष्टमी का इंतजार कर रहे भक्तों के लिए आज का दिन बेहद खास है। घरों में कान्हा के स्वागत की तैयारियां पूरी हो चुकी हैं और मंदिरों में भी जन्मोत्सव को लेकर खास सजावट की गई है। दिनभर व्रत रखने के बाद भक्तों की नजर अब उस खास पल पर है, जब आधी रात को भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाया जाएगा।
धार्मिक मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को आधी रात में हुआ था। यही वजह है कि जन्माष्टमी पर भगवान कृष्ण की पूजा के लिए रात का समय सबसे खास माना जाता है। भक्त निशीथ काल में बाल गोपाल का अभिषेक करते हैं, उन्हें नए कपड़े पहनाते हैं और माखन-मिश्री का भोग लगाकर जन्मोत्सव मनाते हैं।
दिल्ली में कब होगा कान्हा का जन्म?
अगर आप दिल्ली में हैं और घर पर कान्हा का जन्मोत्सव मनाने की तैयारी कर रहे हैं, तो पूजा के समय का खास ध्यान रखें। दिल्ली में इस बार निशीथ पूजा का समय रात 11 बजकर 57 मिनट से शुरू होकर 12 बजकर 43 मिनट तक रहेगा।
यानी आधी रात के आसपास करीब 46 मिनट का यह समय कृष्ण जन्म की पूजा के लिए शुभ माना जा रहा है। इसी दौरान भक्त बाल गोपाल का पंचामृत से अभिषेक कर सकते हैं और उन्हें भोग लगाकर आरती कर सकते हैं।
आपके शहर में क्या रहेगा समय?
जन्माष्टमी पर पूजा का समय हर शहर में एक जैसा नहीं होता। सूर्योदय और सूर्यास्त के समय में अंतर होने के कारण निशीथ काल भी शहर के हिसाब से कुछ मिनट आगे-पीछे हो सकता है।
प्रमुख शहरों में पूजा का समय इस तरह बताया गया है:
दिल्ली: रात 11:57 बजे से 12:43 बजे तक
कोलकाता: रात 11:13 बजे से 11:59 बजे तक
मुंबई: मध्यरात्रि के आसपास
पुणे: मध्यरात्रि के आसपास
बेंगलुरु: मध्यरात्रि के आसपास
हैदराबाद: मध्यरात्रि के आसपास
अगर आप किसी दूसरे शहर में हैं तो स्थानीय पंचांग के अनुसार निशीथ काल देखना सबसे सही रहेगा।
रात 12 बजे ही क्यों मनाया जाता है कृष्ण जन्म?
अब सवाल आता है कि आखिर जन्माष्टमी पर आधी रात को ही कान्हा का जन्म क्यों मनाया जाता है?
धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान कृष्ण का जन्म मथुरा की जेल में आधी रात के समय हुआ था। इसी वजह से हर साल जन्माष्टमी की रात 12 बजे के आसपास मंदिरों और घरों में कृष्ण जन्म का उत्सव मनाया जाता है।
जैसे ही जन्म का समय होता है, मंदिरों में घंटियां और शंख बजने लगते हैं। कहीं कान्हा को झूले में झुलाया जाता है तो कहीं बाल गोपाल का दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल से अभिषेक किया जाता है। इसके बाद आरती होती है और भक्त माखन-मिश्री का प्रसाद बांटते हैं।
व्रत रखने वाले भक्त कब खोलें उपवास?
जन्माष्टमी पर व्रत रखने वाले लोगों के लिए पारण का समय भी महत्वपूर्ण होता है। व्रत कब खोलना है, यह संबंधित परंपरा और स्थानीय पंचांग के अनुसार अलग हो सकता है। इसलिए व्रत खोलने से पहले अपने शहर के पंचांग में दिए गए पारण समय को देखना बेहतर रहेगा।
कई घरों में रात 12 बजे कृष्ण जन्म के बाद पूजा और प्रसाद ग्रहण किया जाता है, जबकि कुछ परंपराओं में अगले दिन सूर्योदय के बाद पारण किया जाता है।
कान्हा को क्या भोग लगाएं?
कृष्ण जन्म के मौके पर भगवान को माखन-मिश्री का भोग लगाना सबसे लोकप्रिय परंपराओं में से एक है। इसके अलावा फल, दूध से बनी मिठाइयां, धनिया पंजीरी और पंचामृत भी चढ़ाया जाता है।
अगर घर पर पूजा कर रहे हैं तो बहुत ज्यादा तैयारी की जरूरत नहीं है। साफ-सफाई के बाद बाल गोपाल को स्नान कराएं, उन्हें नए वस्त्र पहनाएं, झूले में बैठाएं और अपनी श्रद्धा के अनुसार भोग लगाकर आरती करें।
आखिर में बात सिर्फ पूजा की नहीं, उस भावना की है जिसके साथ भक्त कान्हा का स्वागत करते हैं। आधी रात को जब घर में ‘नंद के घर आनंद भयो’ की गूंज होती है और छोटे से झूले में बाल गोपाल को झुलाया जाता है, तो यही जन्माष्टमी का सबसे खूबसूरत पल बन जाता है।
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