विजय का ‘पावर शेयरिंग’ दांव: तमिलनाडु में थलपति की एक चाल ने कांग्रेस के अरमानों पर फेरा पानी

Vijay

चेन्नई। तमिलनाडु की राजनीति में अभिनेता विजय (थलपति) की एंट्री ने वह कर दिखाया है जो दशकों से राज्य के बड़े दल नहीं कर पाए। अपनी पार्टी ‘तमिझगा वेत्री कड़गम’ (TVK) के जरिए विजय ने ‘सत्ता में हिस्सेदारी’ (Alliance Government) का जो कार्ड खेला है, उसने न केवल सत्तारूढ़ DMK की धड़कनें बढ़ा दी हैं, बल्कि कांग्रेस के उस पुराने सपने को भी तोड़ दिया है जिसमें वह राज्य सरकार का हिस्सा बनने की उम्मीद लगाए बैठी थी।

द्रविड़ राजनीति की ‘एकतरफा’ परंपरा को चुनौती
तमिलनाडु का राजनीतिक इतिहास गवाह है कि यहाँ गठबंधन भले ही होते हों, लेकिन सरकार हमेशा बड़े दल (DMK या AIADMK) की ही रही है। सहयोगियों को केवल चुनाव में सीटें दी जाती हैं, कैबिनेट में कुर्सी नहीं। विजय ने अपनी पहली ही बड़ी रैली में इस परंपरा को जड़ से उखाड़ने का ऐलान कर दिया। उन्होंने साफ कहा कि जो दल उनके साथ आएंगे, वे केवल चुनावी साथी नहीं होंगे, बल्कि सरकार बनने पर सत्ता में बराबर के साझीदार होंगे।

कांग्रेस के लिए ‘कुआं और खाई’ जैसी स्थिति
कांग्रेस पार्टी के लिए यह स्थिति सबसे ज्यादा मुश्किल पैदा करने वाली है। तमिलनाडु में कांग्रेस सालों से DMK के जूनियर पार्टनर के तौर पर काम कर रही है। कांग्रेस का एक बड़ा धड़ा लंबे समय से यह मांग कर रहा है कि उन्हें केवल सीटों से समझौता नहीं करना चाहिए, बल्कि सरकार में मंत्री पद भी मिलने चाहिए।

सपना टूटा: कांग्रेस को उम्मीद थी कि 2026 के चुनावों में वे DMK पर दबाव बनाकर कैबिनेट में जगह मांग लेंगे। लेकिन विजय के ‘पावर शेयरिंग’ ऑफर ने बाजी पलट दी।

सौदेबाजी की ताकत खत्म: अब अगर कांग्रेस DMK से ज्यादा मांग करती है, तो DMK के पास विजय का डर दिखाकर उन्हें चुप कराने का मौका है। वहीं, अगर कांग्रेस विजय की ओर झुकती है, तो उन्हें एक नई और अनजानी राह पर चलना होगा, जो फिलहाल जोखिम भरा लग रहा है।

छोटे दलों के लिए ‘चुंबकीय’ आकर्षण
विजय की यह चाल केवल कांग्रेस ही नहीं, बल्कि VCK और वामपंथी दलों जैसे छोटे सहयोगियों के लिए भी एक बड़ा लालच है। ये दल सालों से द्रविड़ दिग्गजों के पीछे खड़े रहते हैं, लेकिन प्रशासन में इनकी कोई भूमिका नहीं होती। विजय ने उन्हें ‘किंगमेकर’ के बजाय सीधे ‘साझीदार’ बनने का मौका दिया है।

विपक्ष और सत्ता पक्ष दोनों अलर्ट

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि विजय ने बहुत ही समझदारी से उस खाली जगह को भरने की कोशिश की है जो राज्य की जनता महसूस कर रही थी।

1. AIADMK की चिंता:
विजय का बढ़ता कद विपक्ष के वोटों में सेंध लगा सकता है।

2. DMK की रणनीति:
स्टालिन को अब अपने सहयोगियों को एकजुट रखने के लिए कुछ ऐसा देना होगा जो विजय के ‘कैबिनेट बर्थ’ वाले ऑफर की बराबरी कर सके।

विजय ने यह साफ कर दिया है कि वे केवल फिल्मों की तरह पर्दे पर नायक नहीं बनना चाहते, बल्कि तमिलनाडु की सत्ता की चाबी अपने हाथ में रखना चाहते हैं। उनकी इस एक चाल ने कांग्रेस को रक्षात्मक मुद्रा में ला खड़ा किया है और तमिलनाडु के आगामी विधानसभा चुनाव को एक बेहद पेचीदा शतरंज के खेल में बदल दिया है। जहाँ अब तक मुकाबला केवल ‘दो ध्रुवों’ के बीच था, वहां अब विजय एक मजबूत तीसरे कोने के रूप में उभर आए हैं।

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