New Delhi: पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों उथल-पुथल का माहौल देखने को मिल रहा है। विधानसभा चुनाव में हार के बाद से तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर असंतोष की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। पार्टी के कई नेताओं के खिलाफ कार्रवाई और संगठन के भीतर बढ़ती नाराजगी ने नेतृत्व के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। इसी बीच बड़ी संख्या में विधायकों के बागी होने के दावे ने राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज कर दी है।
फिरहाद हकीम का इस्तीफा बना बड़ा राजनीतिक संकेत
टीएमसी के वरिष्ठ नेता और कोलकाता के मेयर फिरहाद हकीम ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। लंबे समय से कोलकाता नगर निगम की कमान संभाल रहे हकीम को पार्टी का प्रभावशाली चेहरा माना जाता है। उनके इस्तीफे को राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि वे मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के करीबी नेताओं में गिने जाते रहे हैं। माना जा रहा है कि प्रशासनिक परिस्थितियों और नगर निगम की कार्यप्रणाली को लेकर उठे सवालों के बीच यह फैसला लिया गया है।
नगर निगम की भूमिका को लेकर टीएमसी का आरोप
टीएमसी नेता कुणाल घोष ने इस्तीफे पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि राज्य सरकार की नीतियों के कारण कोलकाता नगर निगम की प्रभावशीलता लगातार कम होती जा रही थी। उनके अनुसार, निगम की शक्तियां सीमित होने के कारण प्रशासनिक कार्य प्रभावित हो रहे थे। इसी वजह से फिरहाद हकीम ने सम्मानजनक तरीके से पद छोड़ने की इच्छा जताई थी, जिसे अंततः पार्टी नेतृत्व की मंजूरी मिल गई।
बागी गुट के दावों से बढ़ी सियासी चुनौती
दूसरी ओर, टीएमसी से निष्कासित नेता रिताब्रता बनर्जी ने दावा किया है कि पार्टी के दर्जनों विधायक उनके समर्थन में हैं। उन्होंने कहा कि विधानसभा में उनके गुट को पर्याप्त समर्थन प्राप्त है और वे खुद को वैध विपक्षी धड़े के रूप में देख रहे हैं। रिताब्रता का यह दावा टीएमसी नेतृत्व के लिए नई चुनौती माना जा रहा है। यदि बागी गुट की ताकत और बढ़ती है, तो आने वाले समय में पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
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Ms. Pooja, |
