मदद नहीं, हर्जाना दो”: नेपाल में आई बाढ़ के लिए काठमांडू ने विकसित देशों पर फोड़ा भड़ास

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पड़ोसी देश नेपाल में हाल ही में आई भीषण प्राकृतिक तबाही ने चारों तरफ कोहराम मचा दिया है। त्रिशूली और भोटेकोशी नदी घाटियों में अचानक आए उफान और चट्टानों के खिसकने से बड़ा विनाश हुआ है। सैकड़ों जानें जा चुकी हैं और देश का बुनियादी ढांचा पूरी तरह तहस-नहस हो गया है। हालांकि, इस तबाही के बीच नेपाल सरकार के ताजा बयान ने पूरी दुनिया का ध्यान खींच लिया है। नेपाल ने वैश्विक समुदाय को स्पष्ट शब्दों में चेताया है कि उसे किसी देश की दया या चैरिटी की जरूरत नहीं है, बल्कि इस तबाही की भरपाई के लिए उचित क्षतिपूर्ति मिलनी चाहिए।

दुनिया के बड़े प्रदूषक देशों पर सीधा निशाना

नेपाल के प्रशासनिक अधिकारियों और कूटनीतिक हलकों ने इस अचानक आई आपदा के लिए दुनिया के बड़े औद्योगिक और सबसे ज्यादा कार्बन उत्सर्जन करने वाले देशों को कटघरे में खड़ा किया है। काठमांडू का कहना है कि दुनिया भर में फैल रहे प्रदूषण में नेपाल का योगदान न के बराबर है, लेकिन जलवायु परिवर्तन का सबसे पहला और जानलेवा वार उसी के पर्वतीय इलाकों को झेलना पड़ रहा है। कारखानों और गाड़ियों से निकलने वाली गैसों के कारण हिमालय का तापमान तेजी से बढ़ रहा है, जिससे ग्लेशियर पिघल रहे हैं और बादल फटने जैसी घटनाएं रोज का नियम बनती जा रही हैं।

अधिकार का दावा, न कि राहत की भीख

संयुक्त राष्ट्र संघ और वैश्विक जलवायु मंचों को भेजे संदेश में नेपाल ने अपना पक्ष बेहद बेबाकी से रखा है। नेपाल का मानना है कि तबाही के बाद दी जाने वाली छोटी-मोटी राहत सामग्री समस्या का समाधान नहीं है। जिन अमीर देशों ने अपनी तरक्की के नाम पर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाया है, यह उनकी नैतिक और कानूनी जवाबदेही बनती है कि वे प्रभावित छोटे देशों को आर्थिक भरपाई दें। इस भीषण जलप्रलय से नेपाल को अरबों रुपये का नुकसान पहुंचा है, जिसे अपने दम पर संभालना किसी भी विकासशील देश के बस की बात नहीं है।

अंतरराष्ट्रीय नीति पर पड़ेगा असर

नेपाल के इस आक्रामक रुख से साफ है कि वह आने वाले समय में पर्यावरण से जुड़े अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में चुप नहीं बैठने वाला है। काठमांडू ने साफ मांग रखी है कि आपदा के बाद की कागजी प्रक्रियाओं को खत्म कर जलवायु न्याय के तहत एक मजबूत मुआवजा तंत्र बनाया जाए। नेपाल का यह कदम उन सभी पर्वतीय और छोटे देशों की आवाज बन सकता है, जो बिना किसी गलती के विकसित देशों के प्रदूषण का खामियाजा भुगत रहे हैं।

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