पिटे खेलों में भारतीय मुक्केबाजों, एथलीटों और जूडो ने जान फूंकी

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ग्लासगो कॉमनवेल्थ खेलों में किस देश ने सर्वाधिक पदक जीते और भारत के हिस्से कितने पदक आए यह सवाल इस लिए महत्वहीन हो गया है क्योंकि ये खेल महज खानापुरी थे l वरना क्या कारण है कि इन खेलों को आयोजन समिति और कॉमनवेल्थ फेडरेशन ने भी गंभीरता से नहीं लिया l क्या कारण है कि कुश्ती, बैडमिंटन, हॉकी, महिला क्रिकेट, टेबल टेनिस और स्क्वाश जैसे प्रमुख खेलों को आयोजन से बाहर रखा गया? आयोजकों ने साफ तौर पर कहा कि उनके पास साधनों क़ी कमी है, पैसा नहीं है और तमाम ताम झाम जोड़ने के लिए भी उनके पूरी तैयारी नहीं है l ऐसी हालात में आयोजकों ने मात्र दस खेलोंके आयोजन क़ी स्वीकृति दी और इतने ही प्रमुख खेल आयोजन का हिस्सा नहीं बन पाए l फ़िरभी मुक्केबाजों, जूडो खिलाड़ियों और एथलीटों के रिकॉर्ड तोड़ प्रदर्शन के चलते भारतीय मान सम्मान को बनाए जरूर रखा है l

साफ हो गया है कि कॉमनवेल्थ खेल गंभीर खेल नहीं हैँ और इनकी तुलना किसी भी आयोजन से नहीं की जा सकती l यह भो कहा जाता है कि इन खेलों के माथे पर गुलाम देशो के खेल का कलंक गुदा है l इस बार के आयोजन से यह साफ हो गया है की चार पांच प्रमुख देशों के प्रदर्शन को एक तरफ कर दें तो बाकी का आयोजन हास्यास्पद रह जाएगाl जिन छह प्रमुख खेलों को बाहर किया गया है उनमें भारत ने 2022 के बर्मिमंघम खेलों में 30 पदक जीत कर पदक तालिका में सम्मान पाया था, जिनमें कुश्ती के 12, टीटी के 7, बैडमिंटन के 6 पदक भी शामिल हैँ l

ऐसे में देश के खेल जानकार और विशेषज्ञ कह रहे हैँ कि चार साल बाद भारत में आयोजित होने वाले खेलों की हैसियत को ग्लासगो कि मेजबानी ने बट्टा लगा दिया है l यह भी पूछा जाने लगा है कि आखिर ऐसे मरियल और बेमतलब खेलों के आयोजन से भारत को क्या मिल जाएगा? ऐसे में 2010 के खेलों की याद ताज़ा हो गई है l तब नई दिल्ली ने शानदार आयोजन किया था l पदक तालिका में भी भारत को सम्मानजनक स्थान मिला था लेकिन कुछ घोटालेबाजों के भ्र्ष्टाचार से देश का नाम ख़राब हुआ l उनमें से कुछ एक अब भी खेल भ्र्ष्टाचार का सुख भोग रहे हैँ! उन खेलों का जिनकी पहचान और प्रतिष्ठा लगातार गिर रही है!

Rajender Sajwan Rajender Sajwan,
Senior, Sports Journalist
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