भारत का व्यापार घाटा एक बार फिर चर्चा में है। इसकी सबसे बड़ी वजह उन वस्तुओं का बढ़ता आयात है, जिनकी देश में भारी मांग है लेकिन जिनके लिए अभी भी विदेशों पर काफी हद तक निर्भर रहना पड़ता है। इनमें सबसे आगे कच्चा तेल, इलेक्ट्रॉनिक सामान और सोना-चांदी व अन्य कीमती धातुओं से जुड़ा आयात शामिल है।
भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल दूसरे देशों से खरीदता है। ऐसे में जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें बढ़ती हैं या आयात ज्यादा होता है, तो देश का आयात बिल भी बढ़ जाता है। इसका सीधा असर व्यापार घाटे पर पड़ता है। यही वजह है कि कच्चा तेल आज भी भारत के सबसे बड़े आयातों में शामिल है।
दूसरी ओर, मोबाइल फोन, लैपटॉप, कंप्यूटर पार्ट्स, चिप्स और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है। भारत में इनका उत्पादन पहले की तुलना में जरूर बढ़ा है, लेकिन कई अहम पुर्जों और हाई-टेक उपकरणों के लिए अभी भी विदेशों पर निर्भरता बनी हुई है। इससे इलेक्ट्रॉनिक्स का आयात लगातार ऊंचे स्तर पर बना हुआ है।
तीसरा बड़ा कारण सोना और अन्य कीमती धातुओं का आयात है। भारत में सोना सिर्फ निवेश का साधन नहीं, बल्कि शादी-ब्याह और पारंपरिक जरूरतों का भी अहम हिस्सा है। जब सोने की मांग बढ़ती है, तो आयात भी बढ़ता है और इसका असर व्यापार घाटे पर दिखाई देता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि व्यापार घाटा तब बढ़ता है, जब किसी देश का आयात उसके निर्यात से ज्यादा हो जाता है। यानी देश जितना सामान विदेशों को बेच रहा है, उससे ज्यादा कीमत का सामान बाहर से खरीद रहा है। यही अंतर व्यापार घाटा कहलाता है।
हालांकि, सरकार लगातार घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने की कोशिश कर रही है ताकि इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य उत्पादों के लिए विदेशी बाजारों पर निर्भरता कम हो। साथ ही ऊर्जा के क्षेत्र में भी आत्मनिर्भर बनने की दिशा में कई योजनाओं पर काम किया जा रहा है।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि अगर भारत घरेलू उत्पादन बढ़ाने और निर्यात को और मजबूत करने में सफल रहता है, तो आने वाले समय में व्यापार घाटे को कम किया जा सकता है। फिलहाल कच्चा तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स और सोने का बढ़ता आयात देश के व्यापार संतुलन पर सबसे ज्यादा दबाव बना रहा है।
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