वाशिंगटन।राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के ‘अमेरिका फर्स्ट’ एजेंडे को एक बड़ी कानूनी हार का सामना करना पड़ा है। अमेरिकी फेडरल कोर्ट ने राष्ट्रपति द्वारा हाल ही में घोषित की गई 10% टैरिफ (आयात शुल्क) पॉलिसी को ‘असंवैधानिक’ और ‘अवैध’ करार देते हुए पूरी तरह रद्द कर दिया है। अदालत के इस फैसले ने न केवल ट्रम्प प्रशासन की आर्थिक नीतियों पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि वैश्विक बाजारों में भी एक नई बहस छेड़ दी है।
अदालत की सख्त टिप्पणी: शक्तियों का हुआ दुरुपयोग
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायाधीश ने ट्रम्प प्रशासन के उस तर्क को खारिज कर दिया, जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर टैरिफ लगाने की बात कही गई थी। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा:
संवैधानिक मर्यादा: राष्ट्रपति के पास व्यापार संबंधी फैसले लेने का अधिकार है, लेकिन वह कांग्रेस (संसद) की शक्तियों का अतिक्रमण नहीं कर सकते।
तथ्यों की कमी: अदालत ने पाया कि 10% अतिरिक्त टैक्स लगाने के लिए जो आधार दिए गए थे, वे कानूनी रूप से अपर्याप्त थे।
*प्रक्रिया का उल्लंघन: टैरिफ लागू करने से पहले जरूरी प्रशासनिक प्रक्रियाओं और सार्वजनिक फीडबैक की अनदेखी की गई।
क्यों लगा था यह 10% टैरिफ?
राष्ट्रपति ट्रम्प ने पद संभालते ही अपनी चुनावी घोषणा के अनुरूप चीन, मेक्सिको और कनाडा सहित कई देशों से आने वाले सामानों पर 10% से 25% तक का आयात शुल्क लगाने का ऐलान किया था। उनका तर्क था कि इससे अमेरिकी उद्योगों को बढ़ावा मिलेगा और व्यापार घाटा कम होगा। हालांकि, अमेरिकी व्यापारियों और खुदरा विक्रेताओं ने इसके खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया था। उनका तर्क था कि इस टैक्स का बोझ अंततः अमेरिकी उपभोक्ताओं पर पड़ेगा और महंगाई आसमान छूने लगेगी।
बाजार और अर्थव्यवस्था पर असर
अदालत के इस फैसले का असर तुरंत देखने को मिला है:
1. शेयर बाजार में हलचल: वॉल स्ट्रीट पर रिटेल और टेक्नोलॉजी सेक्टर के शेयरों में बढ़त देखी गई है, क्योंकि इन कंपनियों को अब अतिरिक्त टैक्स नहीं देना होगा।
2. अंतरराष्ट्रीय राहत: मेक्सिको और चीन जैसे व्यापारिक साझीदारों ने इस फैसले का स्वागत किया है, जिससे संभावित ‘ट्रेड वॉर’ (व्यापार युद्ध) का खतरा फिलहाल टल गया है।
3. महंगाई में राहत: अर्थशास्त्रियों का मानना है कि टैरिफ रद्द होने से रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों में होने वाली संभावित बढ़ोतरी रुक जाएगी।
व्हाइट हाउस की प्रतिक्रिया: “हम अपील करेंगे”
अदालत के इस कड़े प्रहार के बाद व्हाइट हाउस ने अपनी नाराजगी व्यक्त की है। राष्ट्रपति कार्यालय की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि यह फैसला अमेरिकी श्रमिकों और उद्योगों के हितों के खिलाफ है। प्रशासन इस फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालत में अपील करने की तैयारी कर रहा है।
यह फैसला डोनाल्ड ट्रम्प की ‘टैरिफ वॉर’ रणनीति के लिए एक बड़ा सेटबैक है। जहाँ एक तरफ इसे कानून की जीत बताया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ ट्रम्प समर्थक इसे न्यायपालिका द्वारा उनके काम में बाधा डालने की कोशिश मान रहे हैं। अब देखना होगा कि ट्रम्प प्रशासन कानून के दायरे में रहकर अपनी ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति को कैसे आगे बढ़ाता है।
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