भारतीय फुटबाल प्रेमियों के लिए एक बड़ी दुखद खबर यह आई है कि हमारी पुरुष टीम को आगामी एशियाई खेलों में भाग लेने के लिए नहीं भेजा जा रहा l फुटबाल से प्यार करने वाले देशवासियों को यह खबर कदापि अच्छी नहीं लगी l लेकिन देश का पैसा बर्बाद करना भी समझदारी नहीं हैl टीम को भेजा जाता है तो करोड़ों का खर्च होगा, जिसे फिजूल खर्ची ही कहा जाएगा, क्योंकि भारतीय राष्ट्रीय फुटबाल टीम से कोई उम्मीद नहीं है l पिछले कुछ सालों के प्रदर्शन पर नज़र डालें तो भारतीय खिलाड़ी कुछ और अपयश बटोर सकते हैं l ऐसे में खेल मंत्रालय साधुवाद का पात्र है जिसने सही समय पर ठोस कदम उठा कर भारतीय फुटबाल को और अधिक बदनामी से बचा लिया है l
हालांकि इस फैसले ने देश के खिलाड़ियों का दिल तोड़ा है, उनके सपनों की उड़ान पर अंकुश लगाया है l लेकिन एक बड़ा वर्ग कह रहा है कि भारतीय फुटबाल की लगातार फज़ीहत हो रही है और टीम को भेजना ठीक नहीं होगा l बेशक, फेडरेशन की करतूतों की सजा खिलाड़ियों को भुगतनी पड़ रही है l नियमों के हिसाब से महाद्वीप की पहली आठ टीमों को सीधा प्रवेश मिल सकता है लेकिन भारत रैकिंग में 24 वें स्थान पर है l ऐसे में टीम को भेजा जाना न्यायसंगत भी नहीं है l
खेल मंत्रालय के सख्त कदम की खिलाड़ियों द्वारा निंदा की जा रही हैं उनके सपने टूटे हैं लेकिन सवाल यह पैदा होता हैं कि सिर्फ हारने और देश का नाम खराब करने के लिए टीम को क्यों भेजा जाए l यह ना भूलें कि पिछले चार पांच दशकों से भारतीय फुटबाल का स्तर निरंतर गिरता आया है l 1951 और 1962 में एशियायी खेलों का स्वर्ण जीतने वाले देश का हाल यह है कि आज उसके पास 11 ऐसे खिलाड़ी नहीं हैं जोकि भारतीय फुटबाल की खोई साख वापस लौटा सकें l यही कारण है कि सरकार को कठोर फैसला करना पड़ा है l लेकिन सजा सिर्फ खिलाड़ियों को क्यों ? असली गुनहगार फुटबाल फेडरेशन है, जिसके नाकारापन और भ्र्ष्टाचार के चलते भारतीय फुटबाल बर्बाद हुई है l
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Rajender Sajwan, Senior, Sports Journalist |
