सड़ा गला खेल ढांचा और दावा जग जीतने का!

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समें दो राय नहीं कि किसी भी देश का भविष्य उसके स्कूलों पर टिका होता हैl यह भी सच है कि जैसी शिक्षा मिलेगी वैसा ही समाज और देश बनेगा l ठीक इसी प्रकार खेल भविष्य का निर्धारण भी स्कूल स्तर के प्रदर्शन पर निर्भर करता है l इस कसौटी पर यदि भारतीय खेलों को कसा जाए तो निराशा और हताशा के अलावा कुछ भी नज़र नहीं आता l सरकारें भले ही देश को खेल महाशक्ति बनाने की हुंकार भरें, खोखले दावे करें लेकिन दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के स्कूली खेलों में जो कुछ सिखाया पढ़ाया जाता है उसके दम पर विश्व स्तर पर पहचान बनाना, नाम कमाना और देश के लिए पदक जीतना कदापि मुमकिन नहीं है l एक सर्वे से यह पत्रकार इस नतीजे पर पहुंचा है कि स्कूल स्तर पर खेलों का बुरा हाल है l इसलिए क्योंकि भ्र्ष्टाचार अपने पूरे चरम पर है और सरकारी खेल अधिकारी और तमाम विभाग खेलों को दीमक की तरह चाट रहे हैं l

पहली बाधा यह है कि ज्यादातर स्कूलों के पास खेलने के मैदान नहीं हैं l यदि हैं तो खेलने का सामान नहीं मिलेगा क्योंकि स्कूल प्रबंधन- टीचर, प्रिंसिपल और अन्य खेल बजट को चट कर जाते हैं l पढ़ाई के बोझ के चलते खेल के लिए समय निकालना आसान नहीं होता ऊपर से खिलाड़ियों के लिए खेल उपकरण उपलब्ध नहीं होते l फिर भला कोई अपना समय क्यों बर्बाद करे? ऐसी हालात में अभिभावक भी अपने बच्चों को खेलने के लिए बाध्य नहीं कर पाते l सर्वे से यह भी पता चला है कि आधे अधूरे खिलाड़ी ज्यादातर वही बच्चे बन पाते हैं जोकि पढ़ाई लिखाई में बेहद कमजोर होते हैं l लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि पढ़ाई लिखाई की तरह खेल में भी स्वस्थ दिमाग के खिलाड़ी ही कामयाब होते हैं l

चलिए जैसे तैसे कुछ विद्यार्थी खेल मैदान का रुख करते हैं लेकिन खेल विभाग का गड़बड़ झाला, उम्र की धोखा धड़ी और चयन में धांधली रही सही हिम्मत तोड़ देते हैं l हाल के कुछ आंकड़ों से पता चला है कि स्कूली खेल महज तमाशा बन गए हैं l 15 साल के आयु वर्ग में, 18 साल के और 17 साल के वर्ग में 20 -22 साल के खिलाड़ी देश की खेल व्यवस्था का मज़ाक़ उड़ाते, तमाशा बनाते मिल जाएंगे l अपनी खेल पत्रकारिता के 45 वर्षों के अनुभव के आधार पर यह पत्रकार दावे के साथ कह सकता है कि देश के स्कूली खेल भ्र्ष्टाचार, व्यविचार, उम्र की धोखाधड़ी और स्कूल प्रशासन एवम खेल विभाग की लूट के शिकार हैं l पिछले कुछ सालों में देखने में आया है कि राष्ट्रीय स्कूली खेलों की मेजबानी के लिए बोलियां लगती हैं l जिसे मेजबानी मिलती है उसकी पहली प्राथमिकता अधिकाधिक लूट होती हैl आयोजन शहर से मीलों दूर किए जाते हैं ताकि वहां तक जाँच एजेंसियां पहुँच ना सकें l

भाग लेने वाले स्कूलों से मोल भाव किया जाता है और जो तैयार नहीं होते उन्हें पहले ही निपटा दिया जाता है l भुक्त भोगियों के अनुसार खाने पीने और रहने की बेहद घटिया व्यवस्था होती है l इतना ही नहीं मैचों का कार्यक्रम फिक्सचर मेजबान की सुविधा से तय किया जाता है l रेफरी जज की नियुक्ति भी बेईमानी और पक्षपात के आधार पर होती है l कुछ पीड़ितों और शिकार हुए खिलाड़ियों के अनुसार साफ गोल को नकार देना, चौके को छक्का करार देना, 100, 200 मीटर की दौड़ जीतने वालों को बेवजह डोप में फंसाने का डर दिखा कर पदक छीन लेना, नाकारा रेफरी -जजों की सेवाएं लेना आम बात है l

यह हाल उस देश के स्कूली खेलों का है जोकि खेल महाशक्ति बनने की हुंकार भर रहा है l उस देश का है जिसकी 150 करोड़ की जनसंख्या में किसी भी खेल की राष्ट्रीय टीम गठित करने का माद्दा नहीं है, जहाँ बच्चे खिलाड़ी बनने से पहले नशाखोर बन रहे हैं, और जिस देश में उम्र की धोखाधड़ी चरम पर है l

अंत में देश के खेलों की बर्बादी का एक बड़ा कारण नालायक कोचों की नियुक्ति, उनका खेल अज्ञान और लूट खसोट को भी बताया जा रहा हैl देखने में आया है कि कोच, रेफरी, अंपायर ऐसे लोग बन रहे हैं जोकि खुद अच्छे खिलाड़ी नहीं रहेl देश के खेल आका क्या कहते हैं? खेल प्रेमियों की राय क्या है?? जरूर बताएं l

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Pooja Kumari Ms. Pooja,
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