ये नौकरी की रेबड़ी कौन बाँट रहा है?

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पिछले कुछ महीनों से सोशल मीडिया, खासकर फेसबुक पर खिलाड़ियों के लिए नौकरियों की बाढ़ सी आई हुई है l बैंक, बीमा कम्पनियाँ, साई, खेल मंत्रालय, विभिन्न सरकारी और गैर सरकारी विभागों में ‘नौकरियां ही नौकरियां’, जैसे लेख, विज्ञापन- पढ़ने को मिल रहे हैं l हजारों – लाखों बेरोजगार खिलाड़ी मारे भागे फिर रहे हैं, जिनमे से कुछ एक संपर्क में आए और इस बारे में विस्तार से जानना चाह रहे थे कि आखिर कहाँ और कौन नौकरियां बाँट रहा है? सच्चाई यह है कि लेखक/ पत्रकार भी नहीं समझ पा रहे कि अचानक देश में नौकरियों की बाढ़ कैसे आ गई है? यह पता नहीं चल पा रहा कि नौकरियों के पीछे का प्रलोभन क्या है और कौन अफवाह फैला कर देश के युवाओं को गुमराह कर रहा है!

भारतीय खिलाड़ियों का सबसे बड़ा दर्द यह है कि स्कूल कॉलेज में उन्हें सौतेले व्यवहार का सामना करना पड़ता है l कुछ एक को छोड़ हजारों लाखों खिलाड़ियों के लिए उनका खेल जीवन अभिशाप बन कर रह जाता हैl क्योंकि ना तो शिक्षा पूरी कर पाते हैं और नाही कोई रोजी रोजगार मिल पाता है l नतीजन जीवन भर घर परिवार, माँ – बाप के ताने सुनने पड़ते हैं l ऐसे सैकड़ों खिलाड़ी मिल जाएंगे जिन्हें उम्र निकल जाने के बाद अहसास होता है कि ‘खेलोगे कूदोगे होगे खराब’ वाली कहावत क्यों बनी है l अंततः यही खिलाड़ी अपनी भावी पीढ़ी को उपदेश देता है कि खेल कूद कर जीवन बर्बाद ना करे l

एक राष्ट्रीय स्तर के फुटबॉलर और चालीस साल की खेल पत्रकारिता के अनुभव के आधार पर इतना तो कह सकता हूं कि खेल केवल वही बच्चे खेलें जिनके माँ बाप धनाढय हैंl वरना राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ियों को भी नौकरी के लाले पड़ते देखा है l हजारों लाखों दिहाड़ी -मजदूरी करने के लिए विवश हैं, व्यसनों में पड़ कर जीवन बर्बाद करने वाले भी कई मिल जाएंगे l वह दौर निकाल गया है जब राष्ट्रीय कलर पहनने पर सरकारी नौकरी पक्की हो जाती थी l बैंक, बीमा कम्पनियाँ, पुलिस, रेलवे, सेना और तमाम विभागों में लाखों खिलाड़ियों को रोजगार मिला l लेकिन आज आलम यह है कि बहुत से सरकारी और गैर सरकारी विभागों के खेल कोटे के भ्रामक विज्ञापन सोशल मीडिया पर लुटाए जा रहे हैं l पूछने पर जवाब नहीं मिलता या गुमराह किया जा रहा है l एक तो बेरोजगार खिलाड़ियों की कतार लाखों तक पहुँच गई है, ऊपर से उनकी भावनाओं से खिलवाड़ हो रहा है? सरकार, खेल विभाग और जांच एजेंसियों को मामले की गंभीरता को समझते हुए तह तक जरूर जाना चाहिए l आखिर बेरोजगार खिलाड़ियों की भावनाओं से कौन खिलवाड़ कर रहा है और यह अधिकार उन्हें किसने दिया है?

Rajender Sajwan Rajender Sajwan,
Senior, Sports Journalist
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