कांसा नहीं सोना चाहिए

Indian Hockey 2

भारतीय हॉकी के लिए आगामी ओलंपिक इसलिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि बैक टु बैक दो काँस्य पदक जीतने वाली टीम से अब स्वर्ण पदक की उम्मीद की जा रही है l लेकिन क्या ऐसा हो पाएगा? क्या भारतीय हॉकी एकबार फिर से अपना परचम फहरा पाएगी? देश का आम हॉकी प्रेमी ऐसे सवाल पूछ रहा है, उम्मीद कर रहा है कि इस बार कांसा नहीं सोना भारत आएगा l

बेशक़ हमारी हॉकी का इतिहास गौरवशाली रहा हैl यही एकमात्र खेल था जिसे सिर्फ खेल नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सम्मान, अनुशासन और एकता का प्रतीक माना जाता था l वह दौर था जब भारतीय हॉकी ने अपने बेहतरीन कौशल, गति, शानदार तालमेल और टीम भावना से विश्व हॉकी पर राज किया। तब आजादी के बाद पाकिस्तान हमारा एकमात्र प्रतिद्वन्दवी था l धीरे धीरे ऑस्ट्रेलिया, होलैंड, जर्मनी, इंग्लैंण्ड आदि देशों ने भारत – पाक एकाधिकार को झटका देना शुरू किया l
यूँ तो स्वतंत्रता के बाद भी भारतीय हॉकी का प्रदर्शन शानदार रहा। भारत ने 1948, 1952 और 1956 के ओलंपिक में लगातार स्वर्ण पदक जीतकर अपना दबदबा कायम रखा। 1964 में भी भारत ने ओलंपिक स्वर्ण जीताl तत्पश्चात 1980 के मास्को ओलंपिक में हमने अपना आठवां और अब तक का अंतिम स्वर्ण पदक जीत कर ओलंपिक पदक से तौबा कर ली l क्या 2028 के ओलम्पिक में हम एकबार फिर से चैंपियन बन सकते हैं? हालांकि पिछले कुछ प्रदर्शन इस बात की गवाही नहीं देते l आठवें, नौवें नंबर की टीम से ख़िताब जीतने की उम्मीद करना न्याय संगत भी नहीं है l लेकिन अभी पर्याप्त समय है l इस बीच हॉकी इंडिया अपने विवादों को भुला कर खिलाड़ियों पर ध्यान दे तो असम्भव सा लगने वाला लक्ष्य साधा जा सकता है l बेशक़, समय के साथ अंतरराष्ट्रीय हॉकी में बड़े बदलाव आए। खेल के नियम बदले, कृत्रिम टर्फ का उपयोग शुरू हुआ और फिटनेस व तकनीक का महत्व बढ़ा है l भले ही शुरूआती वर्षों में हम बदलावों के साथ तालमेल नहीं बैठा पाए लेकिन पिछले दो ओलम्पिक में काँस्य जीत कर हमारे खिलाड़ियों ने दिखा दिया है कि उनमें दम है और उम्मीद जगाई है कि स्वर्ण जीत कर शिखर चूमने का वक्त आ गया है l

जहाँ तक महिला हॉकी की बात है तो कुछ एक प्रदर्शन यादगार रहे हैं लेकिन ओलम्पिक और विश्वविजेता बनने में अभी सालों लग सकते हैंl

Rajender Sajwan Rajender Sajwan,
Senior, Sports Journalist
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