हॉकी : ना राज रहा ना ताज बचा!

Sports News 2026 04 03T191528.743

भले ही भारतीय हॉकी ने आठ ओलम्पिक गोल्ड जीतकर अभेद्य रिकॉर्ड कायम किया है लेकिन जहां तक विश्व विजेता कहलाने के गौरव की बात है तो मात्र एक मौका ऐसा आया है जबकि भारतीय हॉकी टीम यह सम्मान अर्जित कर पाई है। 1975 के क्वालालम्पुर वर्ल्ड कप में भारत ने अब तक का अपना पहला और आखिरी विश्व खिताब जीता था। टीम कप्तान थे अजीतपाल सिंह, जिनका जन्मदिन 1 अप्रैल (1947) है। विजय टीम के कोच जेएस बेदी और मैनेजर महान ओलम्पियन बलबीर सिंह सीनियर थे।

लेकिन सवाल यह पैदा होता है कि जो देश आधी सदी में मात्र एक बार चैंपियन बने तो उसे हॉकी का बेताज बादशाह कहना कहां तक ठीक है? सवाल यह भी पूछा जाता है कि जो पिछले पचास सालों में हमारी हॉकी ने क्या कुछ पाया और अगर कुछ भी हासिल नहीं हुआ तो हम क्यों कर डींगे हांकते फिरते हैं? बहाने बनाए जाते हैं कि नकली घास के मैदानों के चलन, हॉकी को नियंत्रित और संचालित करने वालों के भ्रष्टाचार और उनके नकारापन के कारण भारतीय हॉकी पिछड़ती चली गई। हालांकि हॉकी इंडिया विश्व कप जीत के गोल्डन जुबली वर्ष समारोह का आयोजन कर रही है। लेकिन एफआईएच से यह भी पूछा जा सकता है कि 1971 उद्घाटन वर्ष में कांस्य, 1973 में रजत और अंतत: 1975 में स्वर्ण पदक जीतने के बाद हमारी हॉकी की बादशाहत को ग्रहण क्यों लग गया? बेशक, ताज इससे कब का छिन चुका है और बादशाह कहलाने के लायक भी नहीं रहे हैं।

हमारी विश्व कप विजेता टीम में कप्तान अजीतपाल, लेस्ली फर्नांडीज, अशोक दीवान, माइकल किंडो, सुरजीत सिंह, असलम शेर खान, विरेंद्र सिंह, ओंकार सिंह, फिलिप्स, हरचरण, पंवार, अशोक कुमार, गोविंदा, चिमनी, कालिया और मोहिंदर जैसे सितारे शामिल थे जिनमें से पांच चैंपियन अब हमारे बीच नहीं रहे। लेकिन उनके प्रदर्शन की चर्चा हमेशा होती आई है और आगे भी होती रहेगी। फर्क सिर्फ इतना है कि अब हम हॉकी के बेताज बादशाह कहलाने का हक गंवा चुके हैं।

Rajender Sajwan Rajender Sajwan,
Senior, Sports Journalist
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