‘मुक्केबाजी एशियन और वर्ल्ड चैंपियनशिप में भारत के 15, 17 और अन्य आयु वर्गों के मुक्केबाज छा गए।’ ‘जूनियर और सब-जूनियर आयु वर्ग के कुश्ती मुकाबलों में भारतीय लड़के -लड़कियों ने तहलका मचाया।’ ‘स्कूल, कॉलेज और सब-जूनियर तीरंदाजी में भारतीय बालक-बालिकाओं ने लक्ष्य भेदकर भविष्य की उम्मीद जगाई।’ जूडो, ताइक्वांडो और कराटे में भारत छा गया और फलां-फलां चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल खा गया।” इस प्रकार की खबरों को फिलहाल देश का सोशल और प्रिंट मीडिया धड़ल्ले से छाप रहा है। क्योंकि एशियाड सिर पर हैं और ओलम्पिक भी ज्यादा दूर नहीं है इसलिए विभिन्न खेलों के खिलंदड़ प्रशासक जोर-शोर से गरज बरस रहे हैं। हॉकी, टेनिस, वेटलिफ्टिंग और यहां तक कि तैराकी और जिम्नास्टिक में भी ऊंची उड़ान भरी जा रही हैं। लेकिन जब नतीजे सामने आते हैं तो तमाम हवाबाज अंडरग्राउंड हो जाते हैं। यह है भारतीय खेलों का कड़वा सच l
फिलहाल सबसे नजदीक, सबसे ज्यादा प्रतिष्ठित और लोकप्रिय आयोजन के रूप में फीफा वर्ल्ड कप मुंह बाएं खड़ा है और भारतीय फुटबॉल को मुंह भी चिढ़ा रहा है। पचास-सौ सालों से हम फीफा वर्ल्ड कप खेलने के दावे कर रहे हैं लेकिन शायद अगले सौ सालों में भी भारतीय सपना पूरा होता नजर नहीं आता। इसलिए क्योंकि हमारा खेल तंत्र झूठ, भ्रष्टाचार, व्यभिचार, नशाखोरी और ऐज फ्रॉड पर टिका है। वरना क्या कारण है कि जो खिलाड़ी सब-जूनियर, जूनियर, स्कूल और अन्य आयोजनों में पदकों का अंबार लगाते हैं, एशियाड और ओलम्पिक से प्राय: खाली हाथ क्यों लौटते हैं?
खेल जानकारों का मानना है कि भारतीय खेल फेडरेशन, मीडिया और प्रचार तंत्र अपने खेलों की असली तस्वीर पेश नहीं करते। नकारा कोच और प्रशासक खेलों की पीड़ा कम करने की बजाय बढ़ा रहे हैं। ऐसे में खेलों का भला होता कतई नजर नहीं आ रहा। जो खेल कोर्ट कचहरी में खेले जा रहे हैं, उनसे भी बड़ी उम्मीद करना ठीक नहीं होगा। कुल मिलाकर पारदर्शिता की कमी और अनुशासनहीनता भारतीय खेलों का चरित्र बन चुके हैं। नतीजा सबके सामने हैं। दुनिया हम पर हंस रही है।
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Rajender Sajwan, Senior, Sports Journalist |
