ऑस्ट्रेलियाई नागरिकता छोड़ कर भारत के लिए फुटबाल खेलने वाले रयान विलियम्स ने भले ही सिंगापुर जैसे महाँफिसड्डी देश के विरुद्ध गोल जमा कर अपनी उपयोगिता साबित की है लेकिन यह जीत एक प्रकार से भारतीय फुटबाल को बड़ी गाली जैसी लगती हैl इसलिए क्योंकि फुटबाल सामूहिक प्रयास वाला टीम खेल है और अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता l यह भी जान लें कि सिंगापुर की फीफा रैकिंग और खेल का स्तर भारत से भी गया बीता है l लेकिन यदि भारतीय फुटबाल प्रेमी इस जीत से रोमांचित हैं और जश्न मना रहे हैं तो उन्हें बधाई और शुभकामना l सीधा सा मतलब है कि भारतीय फुटबाल ने हाथ खड़े कर दिए हैंl पिछले कई दशकों से हारते – पिटते आलम यह हो गया है कि हम जीतना भूल चुके हैं l ऐसे में सिंगापुर से मिली जीत का जश्न मनाना चाहिए लेकिन साथ ही अपनी गिरेबाँ में भी झाँकना होगा l
इसमें दो राय नहीं कि सिंगापूर के विरुद्ध भारत को उस समय जीत मिली है जब भारतीय फुटबाल ने सारी उम्मीदें छोड़ दी थीं l बेशक़, जीत का श्रेय विलिएम्स को जाता है l उसने पहले ही मुकाबले में अपनी माँ के देश को जीत दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया है l जीतना भूल चुके देश के लिए यदि कुछ और ऐसे खिलाड़ी खोजे जाएं तो शायद भारतीय फुटबाल की गाड़ी पटरी पर लौट सकती है l तो फिर फेडरेशन को कुछ और भारतीय मूल के खिलाड़ियों की खोज में जुट जाना चाहिए l लेकिन यह मानना पड़ेगा कि भारतीय फुटबाल ने सुधार की तमाम उम्मीदें छोड़ दी हैं l खिलाड़ी, कोच और पूरा सिस्टम फेल हो गया है l चूंकि हमारे खिलाड़ियों में दम नहीं रहा इसलिए थक हार कर विलिएम्स जैसे कुछ औरभारतीय मूल के खिलाड़ियों की तलाश पर जोर रहेगा l
ऑस्ट्रेलिया की नागरिकता त्याग कर भारतीय नागरिक बने विलिएम्स 32 साल के हैं l अर्थात उसके पास भारतीय फुटबाल की सेवा के लिए कम ही वर्ष बचे हैं l वैसे भी वह कोई पेले, मराडोना, मेस्सी या रोनाल्डो नहीं है l क्योंकि भारतीय फुटबाल हर मोर्चे पर नाकाम है और सुधार की कोई उम्मीद भी नहीं बची हैl इसलिए विदेशों से भारतीय मूल के अधिकाधिक खिलाड़ियों का आयात किया जाए l लेकिन यह ना भूलें कि विलिएम्स के लिए ऑस्ट्रेलिया की टीम में कोई जगह नहीं थी इसलिए उसे अपने बाप दादा का देश याद आया है l
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Rajender Sajwan, Senior, Sports Journalist |
