क्योंकि फुटबाल अपनी मिट्टी और भाषा से कट गई है!

Football

थोड़ी सी अंग्रेजी बोलकर, घिसे पिटे अनुभव बाँट कर, अपने अल्पज्ञान को हाई बोल्टेज ड्रामे में बदल कर, महानतम खिलाड़ियों को छोटा मुंह बड़ी बात के साथ परोस कर, शरीर को रंग रोगन से गोद कर फीफा वर्ल्ड का सीधा- टेढ़ा प्रसारण दिखा- सुना कर भारतीय फुटबाल के कुछ चैंपियनों ने फीफा वर्ल्ड कप 2026 में भारतीय फुटबाल की उपस्थिति दर्ज कर खासी वाह वाह लूटी है l जिस किसी चैनल ने फीफा कप के मैचों का सीधा प्रसारण किया या प्रमुख मैचों को सीधा भारत तक पहुँचाया वे धन्यवाद के पात्र हैं l बस शिकायत है तो इस बात की कि ज्यादातर पतन काल से जुड़े फुटबालर और कमेंटटर अपने मुंह मियां मिठू बनते दिखाई दिए l इनमें ज्यादातर ऐसे हैं जोकि भारतीय फुटबाल की विनाशलीला के साक्षात् गवाह रहे हैं l
हैरानी वाली बात यह है कि पिछले बीस पच्चीस सालों में भारतीय फुटबाल का सर्वनाश करने वाले अंग्रेजी ब्रांड खिलाड़ियों में से किसी ने भी अपनी फुटबाल को लेकर दुख व्यक्त नहीं किया l एक दूसरे की घटिया उपलब्धियों का बखान करने वाले, नेकर को कच्चा बनाने वाले और सिर्फ और सिर्फ पैसे की खातिर देश की फुटबाल को बर्बाद करने वाले कुछ खिलाड़ियों में से किसी ने भी संजीदगी के साथ यह नहीं कहा कि भारतीय फुटबाल कैसे प्रगति कर सकती है? कैसे हम डेढ़ से पांच लाख की आबादी वाले देशों को अपना गंदा मुंह दिखा सकते है? और हां, ये वही खिलाड़ी हैं जिनके मैदान में रहते नेपाल, बांग्लादेश, अफगानिस्तान जैसे फिसड्डी भी भारत को नीचा दिखाते आए हैं l किसी का नाम लिए बिना यह बताना चाहूंगा कि टीवी पर ज्ञान बांटने वाले उस दौर के चैंपियन है जब भारतीय फुटबाल की साँसे टूट चुकी थीं और हवा फुस्स हो गई थी l
टीवी चैनलों पर वर्ल्ड कप फुटबाल का ज्ञान बांटने वाले ज्यादातर खिलाड़ी वे हैं जोकि अंग्रेजी ब्रांड स्कूलों में पढ़े हैं और अपनी अंग्रेजी बोलने की कला और ऊँची पहुँच वाले परिवारों में पले बढे होने के कारण ही खिलाड़ी बने l इसलिए क्योंकि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले, झोपड़ी पट्टी में पलने वाले और गंदी बस्तियों में रहने वाले प्रतिभावन खिलाड़ियों को इक्कीसवीं सदी के भारत ने पनपने नहीं दिया l यह भी सच है कि देश के दर्जन भर ऐसे खिलाड़ियों के एकाधिकार के चलते भारतीय फुटबाल बर्बाद हुई है, जोकि मुंह में चांदी का चम्मच लेकर पैदा हुए थे l क्योंकि वे अपनी धाराप्रवाह अंग्रेजी के चलते भारतीय फुटबाल के नाकारा पदाधिकारीयों और अनपढ़ कोचों को मोहपाश में जकड़ लेते हैं और देश की फुटबाल पर कब्ज़ा जमा लेते हैं इसलिए गरीब, दमखम वाले खिलाड़ी गुमनामी में खो गए l.यदि यह सच नहीं होता तो चालीस पचास साल पहले भारतीय फुटबाल को सम्मान दिलाने वाले असली चैंपियन खिलाड़ी भारतीय फुटबाल के सर्वे सर्वा होते l वर्ल्ड कप के चलते अवसरवदियों ने उन्हें याद तक नहीं किया l
विश्व फुटबाल पर सरसरी नज़र डालें तो पेले, माराडोना, रोनाल्डो, रोनाल्डइन्हो , क्रिस्चियानो रोनाल्डो, मेस्सी, नेमार, विनीशियस और सैकड़ों अन्य महान फुटबालर अंग्रेजी ब्रांड मानसिकता के गुलाम नहीं रहे l गरीब घरों के इन महान खिलाड़ियों को अपनी मातृ भाषा और संस्कारों से हमेशा प्यार रहा और तमाम बड़े मंचो पर अपनी बोली भाषा को वरीयता देते रहे हैं l लेकिन अपने महांन देश में अंग्रेजी बोलना, हिंदी और हिंदी भाषियों का अनादर करना एक फैशन बन गया है, जिसका फायदा ब्रेड बटर में पले बड़े हुए कुछ अंग्रेजी ब्रांड खिलाड़ी उठा रहे हैं l फेडरेशन अधिकारियों और कोचों को अपनी अंग्रेजी से डराने धमकाने वाले और प्रभावित करने वाले यही खिलाड़ी भारतीय फुटबाल और शायद तमाम खेलों की पहली पसंद बन गए हैं l अभिभावकों और खिलाड़ियों में यह धारणा बनती जा रही है कि दीन हीन, गरीब और कम पढ़े लिखे माता पिता के बच्चे आगे नहीं बढ़ सकते l यह भी कडुवा सच है कि दम तोड़ती भारतीय फुटबाल पर अंग्रेजी माफिया का कब्ज़ा हो गया है l गरीब बच्चे वही खेल पाते हैं, जिनमे प्रतिभा और दमखम है लेकिन आगे नहीं बढ़ पाते, क्योंकि कदम कदम पर उन्हें अनेकों बाधाओं से निपटना पड़ता है l

Rajender Sajwan Rajender Sajwan,
Senior, Sports Journalist

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