डिजिटल ट्रांजैक्शन पर छिड़ी कानूनी जंग: सुप्रीम कोर्ट ने सरकार और आरबीआई से पूछा, आखिर इस वसूली का आधार क्या है?

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देशभर में यूपीआई (UPI) के जरिए होने वाले डिजिटल लेन-देन को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने एक बेहद गंभीर और कड़ा रुख अपनाया है। दो हजार रुपये से अधिक के व्यावसायिक भुगतानों पर लगने वाले मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) के मामले पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, भारतीय रिजर्व बैंक और एनपीसीआई को आड़े हाथों लिया है। अदालत ने सीधे शब्दों में यह जानना चाहा है कि इस तरह के शुल्कों को वसूलने के पीछे आखिरकार कानूनी और वैधानिक आधार क्या है, क्योंकि देश के करोड़ों लोग इन डिजिटल माध्यमों से जुड़े हुए हैं।

अदालत की तीखी टिप्पणी- क्या यह जनता पर लगाया जा रहा टैक्स है?

सुनवाई के दौरान अदालत ने इस पूरे विषय पर गहरी चिंता जताते हुए कई तीखे सवाल किए। बेंच ने साफ तौर पर यह सवाल उठाया कि इस प्रक्रिया के तहत वसूला जाने वाला पैसा आखिरकार किस श्रेणी में आता है और क्या इसे किसी प्रकार का कर या शुल्क माना जाए। कोर्ट का यह भी कहना था कि इस पैसे का अंतिम प्रवाह कहां-कहां होता है और इसका लाभ किन संस्थाओं को मिलता है, इसकी पूरी पारदर्शिता जनता के सामने आनी चाहिए। हालांकि, अभी अदालत ने इस व्यवस्था पर किसी तरह की रोक नहीं लगाई है, लेकिन संबंधित पक्षों को चार हफ्तों के भीतर अपना जवाब दाखिल करने का सख्त निर्देश दिया गया है।

सरकार और बैंकिंग तंत्र की ओर से क्या दी गई सफाई?

सर्वोच्च अदालत के इन तीखे सवालों के जवाब में सरकार और वित्तीय संस्थाओं की तरफ से यह स्पष्ट करने का प्रयास किया गया कि यह किसी भी रूप में सरकारी खजाने में जाने वाला राजस्व नहीं है। उनका पक्ष था कि डिजिटल भुगतानों के इस विशाल नेटवर्क को सुचारू रूप से चलाने और उसकी तकनीकी सुरक्षा बनाए रखने के लिए बैंकों और पेमेंट गेटवे को भारी लागत उठानी पड़ती है। इसी बुनियादी ढांचे के रखरखाव और परिचालन खर्च को संतुलित करने के लिए यह व्यवस्था बनाई गई है, ताकि लेन-देन की प्रक्रिया बिना किसी रुकावट के लगातार चलती रहे।

आम नागरिकों और छोटे दुकानदारों को मिली राहत जारी

इस पूरे विवाद के बीच आम लोगों और छोटे कारोबारियों के लिए राहत की बात यह है कि उनके दैनिक लेन-देन पूरी तरह सुरक्षित रखे गए हैं। सामान्य उपयोगकर्ताओं द्वारा किए जाने वाले आपसी भुगतान (P2P) और दो हजार रुपये तक के छोटे व्यापारी भुगतान पर किसी भी प्रकार का अतिरिक्त शुल्क नहीं लगाया जा रहा है। इसके अलावा छोटे दुकानदार जो क्यूआर कोड के जरिए अपना व्यापार चलाते हैं, उन्हें भी इस दायरे से अलग रखा गया है। बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट के इस कठोर रुख के बाद अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार और आरबीआई अदालत के सामने क्या विस्तृत दस्तावेज पेश करते हैं।

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