दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और दिल्ली हाई कोर्ट के बीच कानूनी टकराव अब एक नए और तीखे मोड़ पर पहुँच गया है। दिल्ली आबकारी नीति मामले की सुनवाई के दौरान केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की बेंच के सामने एक ऐसी याचिका दायर की है जिसने कानूनी गलियारों में हलचल मचा दी है। केजरीवाल ने सीधे तौर पर न्यायाधीश की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए कहा है कि उन्हें इस अदालत से न्याय मिलने की कोई उम्मीद नहीं दिखती। यह मामला केवल एक कानूनी प्रक्रिया नहीं रह गया है, बल्कि न्यायपालिका की पारदर्शिता और आरोपी के अधिकारों के बीच एक बड़ी बहस बन गया है।
पूर्वाग्रह और पक्षपात के सात बड़े आरोप
केजरीवाल ने अपनी याचिका में उन सात प्रमुख कारणों को गिनाया है जिनकी वजह से उनका विश्वास इस बेंच से डगमगा गया है। उनका मुख्य आरोप है कि अदालत का रवैया उनके प्रति पहले से ही एक राय बना चुका है। उन्होंने कहा कि पिछली सुनवाइयों के दौरान कोर्ट ने उनके लिए ‘भ्रष्ट’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया जबकि अभी ट्रायल चल ही रहा है। केजरीवाल के अनुसार, किसी भी व्यक्ति को तब तक निर्दोष माना जाना चाहिए जब तक कि वह दोषी साबित न हो जाए, लेकिन इस अदालत की टिप्पणियां उन्हें पहले ही अपराधी घोषित कर रही हैं। इसके अलावाउन्होंने आरोप लगाया कि अदालत जांच एजेंसियों विशेषकर ईडी और सीबीआई के तर्कों को बिना किसी गहन पड़ताल के स्वीकार कर रही है।
जांच एजेंसियों का समर्थन और निचली अदालत के फैसले की अनदेखी
केजरीवाल की दलील का एक बड़ा हिस्सा इस बात पर केंद्रित है कि हाई कोर्ट ने निचली अदालत के उस विवेक को नजरअंदाज किया, जिसने उन्हें पहले राहत दी थी। उन्होंने आरोप लगाया कि जस्टिस शर्मा की बेंच उन सरकारी गवाहों के बयानों को आधार बना रही है, जिनकी विश्वसनीयता पर पहले ही गंभीर सवाल खड़े हो चुके हैं। केजरीवाल का मानना है कि अदालत का झुकाव पूरी तरह से जांच एजेंसियों की ओर है जिससे एक आरोपी के तौर पर उनके बचाव के रास्ते बंद होते जा रहे हैं। उन्होंने इसे न्यायिक प्रक्रिया का असंतुलन करार दिया।
रिक्यूजल की मांग और न्याय की शुचिता का प्रश्न
केजरीवाल ने अंततः कोर्ट से मांग की है कि जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा को खुद को इस मामले की सुनवाई से अलग कर लेना चाहिए जिसे कानूनी भाषा में ‘रिक्यूजल’ कहा जाता है। उन्होंने तर्क दिया कि न्याय न केवल होना चाहिए बल्कि वह होता हुआ दिखना भी चाहिए। यदि किसी आरोपी के मन में यह उचित संदेह पैदा हो जाए कि उसे निष्पक्ष सुनवाई नहीं मिलेगी, तो उस मामले को दूसरी बेंच के पास भेज दिया जाना चाहिए। केजरीवाल ने स्पष्ट किया कि जब जांच एजेंसियां जज बदलने की मांग कर सकती हैं, तो एक नागरिक के तौर पर उन्हें भी यह अधिकार मिलना चाहिए ताकि कानून के शासन में जनता का भरोसा बना रहे।
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