दुनिया भर में जारी उथल-पुथल और ईंधन के दामों में उतार-चढ़ाव के बीच भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए एक बड़ा फैसला लिया है। भारत एक ऐसे देश से तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (LPG) की सप्लाई बढ़ाने जा रहा है, जहाँ की कुल जनसंख्या में लगभग 99 प्रतिशत आबादी मुस्लिम समुदाय की है। खाड़ी और एशियाई क्षेत्रों के मुस्लिम बहुल ऊर्जा उत्पादक देशों के साथ साझेदारी का यह विस्तार यह साफ दर्शाता है कि जब देश की भलाई और रणनीतिक जरूरतों की बात आती है, तो भारत की विदेश नीति में धर्म या विचारधारा की कोई जगह नहीं होती, बल्कि राष्ट्रीय हित ही सबसे आगे रहता है।
रसोई गैस की बढ़ती मांग और कूटनीति
भारत दुनिया में एलपीजी का एक बहुत बड़ा उपभोक्ता देश है। घरेलू स्तर पर उज्ज्वला योजना के विस्तार और करोड़ों परिवारों तक रसोई गैस की पहुंच की वजह से देश में एलपीजी की खपत लगातार बढ़ रही है। ऐसे में किसी एक या दो देशों पर निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है। इसी जोखिम को कम करने के लिए भारत अब ऐसे देशों से दीर्घकालिक व्यापारिक समझौते कर रहा है जो भौगोलिक रूप से नजदीक हैं और जहाँ से गैस की निर्बाध सप्लाई मिलना तय हो। इस कदम से भारतीय बाजारों में रसोई गैस की किल्लत नहीं होगी और कीमतें भी नियंत्रण में रहेंगी।
व्यापारिक रिश्ते होंगे और मजबूत
इस नए सौदे से न केवल भारत को किफायती दरों पर एलपीजी मिलेगी, बल्कि संबंधित देश के साथ भारत के द्विपक्षीय और आर्थिक संबंध भी एक नए मुकाम पर पहुंचेंगे। समुद्री मार्गों से गैस का आयात आसान होने की वजह से ट्रांसपोर्टेशन का खर्च कम आएगा, जिससे देश की ऑयल रिफाइनरियों और डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क को सीधा लाभ पहुंचेगा। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और गैस के दामों में होने वाले उतार-चढ़ाव से आम जनता को बचाने में यह समझौता एक रक्षा कवच की तरह काम करेगा।
अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का व्यावहारिक रुख
भारत का यह फैसला यह साबित करता है कि आज का भारत अपनी जरूरतों को ध्यान में रखते हुए बेहद व्यावहारिक कूटनीति पर काम कर रहा है। बिना किसी पूर्वाग्रह के केवल देश के 140 करोड़ नागरिकों को सस्ती और सुलभ ऊर्जा उपलब्ध कराना ही सरकार की पहली प्राथमिकता है। मुस्लिम बहुल देशों के साथ ऊर्जा क्षेत्र में बढ़ता यह सहयोग भारत की आर्थिक मजबूती और वैश्विक साख दोनों को नई दिशा देगा।
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