हर साल जब भाद्रपद की चतुर्थी आती है, तो चारों तरफ ‘गणपति बाप्पा मोरया’ की गूंज सुनाई देने लगती है। घरों से लेकर बड़े-बड़े पंडालों तक, बाप्पा का स्वागत बहुत ही धूमधाम और ढोल-नगाड़ों के साथ किया जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि गणेश चतुर्थी को मनाने की शुरुआत कैसे हुई? यह केवल एक धार्मिक पूजा भर नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक बहुत ही दिलचस्प पौराणिक कथा और भारत के आजादी के आंदोलन का एक ऐतिहासिक दौर भी जुड़ा हुआ है।
पौराणिक कथा: जब प्रकट हुए थे बाल गणेश
शास्त्रों और पौराणिक कथाओं के अनुसार, भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को ही भगवान गणेश का जन्म हुआ था। माना जाता है कि माता पार्वती ने अपने उबटन से एक बालक की आकृति बनाई और उसमें प्राण डाल दिए। बाद में जब भगवान शिव ने बालक गणेश का सिर काट दिया था, तब उनकी जगह हाथी का मस्तक लगाया गया और सभी देवताओं ने मिलकर उन्हें प्रथम पूज्य होने का वरदान दिया। इसी दिन को गणेश चतुर्थी या विनायक चतुर्थी के रूप में मनाया जाने लगा।
इतिहास के पन्नों में गणेश उत्सव
इतिहासकारों के अनुसार, गणेशोत्सव को सार्वजनिक रूप से मनाने की शुरुआत सबसे पहले छत्रपति शिवाजी महाराज के समय में हुई थी। मराठा साम्राज्य के दौरान राष्ट्रभक्ति और संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए पुणे में गणेशोत्सव को बहुत बड़े पैमाने पर मनाया जाता था। पेशवाओं के दौर में भी यह परंपरा चलती रही, लेकिन पेशवाओं के पतन के बाद और अंग्रेजों के शासनकाल में यह उत्सव केवल लोगों के घरों तक ही सीमित होकर रह गया।
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का ऐतिहासिक कदम
19वीं सदी के अंत में जब भारत पर अंग्रेजों का राज था, तब अंग्रेजों ने भारतीयों के एक जगह इकट्ठा होने, सभाएं करने और भाषण देने पर कड़े प्रतिबंध लगा रखे थे। ऐसे समय में स्वतंत्रता सेनानी लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने एक अनोखा रास्ता निकाला।
साल 1893 में तिलक जी ने गणेश चतुर्थी को घर की चारदीवारी से निकालकर सड़कों और सार्वजनिक पंडालों तक पहुँचाने का निर्णय लिया। उनका मकसद बहुत साफ था—धर्म और उत्सव के बहाने समाज के सभी वर्गों, जातियों और धर्मों के लोगों को एक जगह इकट्ठा करना। सार्वजनिक गणेशोत्सव के जरिए लोग एक साथ मिलते, आजादी की बातें करते और देश भक्ति के गीतों व नाटकों का आयोजन होता। अंग्रेजों के कानून के बावजूद वे इस धार्मिक आयोजन को रोक नहीं पाए और देखते ही देखते यह उत्सव राष्ट्रीय आंदोलन का एक बहुत बड़ा जरिया बन गया।
महाराष्ट्र से निकलकर पूरी दुनिया में फैली बप्पा की भक्ति
जो शुरुआत पुणे और मुंबई की तंग गलियों से हुई थी, आज वह पूरे देश और विदेश में एक बहुत बड़े पर्व का रूप ले चुकी है। आज केवल महाराष्ट्र ही नहीं, बल्कि गुजरात, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, दिल्ली और देश के कोने-कोने में बड़े-बड़े पंडाल सजाए जाते हैं। दस दिनों तक चलने वाले इस उत्सव में समाज का हर तबका एक साथ मिलकर पूजा-अर्चना करता है, जो आज भी आपसी एकता और भाईचारे की मिसाल पेश करता है।
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