क्रिकेट के बाद भारत में हॉकी और फुटबाल की लोकप्रियता जगजाहिर है l खासकर, फुटबाल पूरे देश का खेल है l भले ही भारतीय फुटबाल साल दर साल और दिन पर दिन रसातल में धसक रही है लेकिन फिर भी दिल है कि मानता नहीं है l क्योंकि यही खेल दुनिया का नंबर वन है इसलिए अपने देश में भी खूब खेला जाता है l कोई फर्क नहीं पड़ता कि हम विश्व फुटबाल में महां फिसड्डी हैं, ओलंपिक में खेल नहीं पाते और एशिया में भी सबसे कमजोर देशों की कतार में सबसे पीछे खड़े हैं l फ़िरभी फुटबाल खुद ब खुद क्रिकेट के बाद दूसरे नंबर का खेल बना हुआ है l तीसरे नंबर का खेल निसंदेह हॉकी है, जिसमें भारतीय खिलाड़ियों का प्रदर्शन अभूतपूर्व रहा हैl
फुटबाल में हम दो बार एशियाई खेलों के विजेता रहे तो हॉकी में आठ ओलंपिक गोल्ड और एक बार विश्व विजेता बन कर हमारी हॉकी ने देश का मान सम्मान सातवें आसमान तक पहुंचा दिया l ध्यान चंद के देश ने इस खेल में खूब नाम सम्मान कमाया लेकिन आज हमारी हॉकी मरते – मरते जीने की कोशिश कर रही है l लेकिन सवाल यह पैदा होता है कि हॉकी का हाल बेहाल क्यों है? क्यों भारतीय हॉकी पहले सी रफ़्तार नहीं पकड़ पा रही?
एक सर्वे से पता चला है कि दोनों ही लोकप्रिय खेल “मैदानों की कमी” के चलते राह भटक गए हैं l यह सही है कि हॉकी कृत्रिम घास के मैदानों में दाखिल होने के बाद से भारत और पाकिस्तान के हाथों से निकल गई है l लेकिन पचास साल बीत जाने के बाद यह बहाना नहीं चलने वाला l हां, यह कटु सत्य है कि हम अधिकाधिक. एस्ट्रो टुर्फ़ मैदान स्थापित नहीं कर पाए l देश भर में उपलब्ध हॉकी मैदान जनसंख्या और खिलाड़ियों के हिसाब से नाकाफी हैं l देश के पांच – सात लाख खिलाड़ियों के लिए कम से कम पांच सौ मैदान चाहिए लेकिन स्तरीय मैदान पचास भी नहीं हैं l यह भी सच है कि हॉकी फुटबाल की तरह जन जन का खेल नहीं बन पाया, जिसके खिलाड़ी लाखों और शायद करोड़ों में हो सकते हैं l लेकिन कहाँ खेलें फुटबाल? कैसे तरक्की करेगी हॉकी??
बेशक़, फुटबाल के चाहने वाले करोड़ों में हैं और सौ में से हर दसवां खिलाड़ी फुटबालर है लेकिन खेले कहाँ? देश की राजधानी दिल्ली में चार से पांच लाख शौकिया फुटबालरों के लिए कुल 15-20 मैदान हैं l नेहरू स्टेडियम, अम्बेडकर स्टेडियम और चार छह अन्य फुटबाल मैदानों पर प्रतिस्पर्धात्मक फुटबाल खेली जाती है, जोकि ऊंट के मुंह में जीरा जैसा है l एक सर्वे से पता चला है कि 150 करोड़ की आबादी वाले देश के स्कूलों में दस लाख छात्र खिलाड़ियों के लिए एक फुटबाल फील्ड और पचास लाख के लिए एक एस्ट्रो टुर्फ़ हॉकी मैदान है l ऐसे में भला खेल कैसे तरक्की करेंगे? बेशक़, दोष खिलाड़ियों, अविभावकों और कोचों का नहीं है l सारे फसाद की जड़ सरकारें हैं, जिन्हें गिरेबाँ में जरूर झाँकना चाहिए l
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Rajender Sajwan, Senior, Sports Journalist |
