भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा सिर्फ आस्था का पर्व नहीं, बल्कि इंसानियत और भाईचारे की मिसाल भी मानी जाती है। इस यात्रा से जुड़ी एक परंपरा ऐसी है, जो हर साल लाखों लोगों को भावुक कर देती है। पुरी में भगवान जगन्नाथ का रथ आज भी मुस्लिम भक्त सालबेग की मजार के सामने कुछ देर के लिए रुकता है। सदियों पुरानी यह परंपरा आज भी उसी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है।
कहा जाता है कि सालबेग का जन्म मुस्लिम परिवार में हुआ था, लेकिन उनका मन भगवान जगन्नाथ की भक्ति में पूरी तरह रम गया था। उन्होंने भगवान की महिमा में कई भजन लिखे, जिन्हें आज भी ओडिशा में बड़े प्रेम से गाया जाता है। उनकी भक्ति इतनी गहरी थी कि लोग उन्हें भगवान जगन्नाथ का अनन्य भक्त मानते थे।
लोककथा के अनुसार, एक बार सालबेग रथ यात्रा के समय भगवान के दर्शन के लिए पुरी लौट रहे थे। रास्ते में उनकी तबीयत बिगड़ गई और उन्हें लगा कि इस बार वे समय पर नहीं पहुंच पाएंगे। उन्होंने भगवान से मन ही मन प्रार्थना की कि जब तक वे नहीं आते, रथ आगे न बढ़े।
मान्यता है कि जब भगवान जगन्नाथ का रथ सालबेग की मजार के पास पहुंचा, तो वह अपने आप रुक गया। काफी कोशिशों के बाद भी रथ आगे नहीं बढ़ा। जब सालबेग वहां पहुंचे और उन्होंने भगवान के दर्शन किए, तब जाकर रथ ने फिर से यात्रा शुरू की। तभी से यह परंपरा चली आ रही है।
आज भी रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ का रथ सालबेग की मजार के सामने कुछ समय के लिए रोका जाता है। इस पल को देखने के लिए हजारों श्रद्धालु वहां मौजूद रहते हैं। उनके लिए यह सिर्फ एक परंपरा नहीं, बल्कि इस बात का संदेश है कि सच्ची भक्ति के सामने धर्म और जाति की दीवारें मायने नहीं रखतीं।
सालबेग की कहानी यह बताती है कि भगवान के लिए सबसे बड़ा परिचय किसी का धर्म नहीं, बल्कि उसकी श्रद्धा और समर्पण होता है। यही वजह है कि सदियों बाद भी उनकी याद रथ यात्रा का एक अहम हिस्सा बनी हुई है और यह परंपरा आज भी लोगों को प्रेम, समानता और आपसी सौहार्द का संदेश देती है।
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