जसपाल राणा ने अपने खेल जीवन में कई ऐसे मुकाम हासिल किए, जिन्होंने उन्हें भारतीय निशानेबाजी के महान खिलाड़ियों की श्रेणी में ला खड़ा किया। 1994 के एशियाई और राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीतकर उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का परचम लहराया। इसके बाद 2006 के दोहा एशियाई खेलों में उनका प्रदर्शन ऐतिहासिक रहा, जहां उन्होंने तीन स्वर्ण और एक रजत पदक अपने नाम किया। राष्ट्रमंडल खेलों में भी उनका दबदबा कायम रहा और उन्होंने कुल 15 पदक जीतकर एक शानदार रिकॉर्ड बनाया।
कोच के रूप में तैयार की नई पीढ़ी
सक्रिय खेल जीवन के बाद जसपाल राणा ने कोचिंग के क्षेत्र में भी असाधारण योगदान दिया। जूनियर राष्ट्रीय टीम और हाई-परफॉर्मेंस कोच के रूप में उन्होंने कई युवा खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया। मनु भाकर, सौरभ चौधरी, अनीश भानवाला और चिंकी यादव जैसे निशानेबाजों की सफलता में उनका मार्गदर्शन अहम माना जाता है। खिलाड़ियों को तकनीकी दक्षता और मानसिक मजबूती प्रदान करने के लिए उन्हें विशेष रूप से जाना जाता था। उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें द्रोणाचार्य पुरस्कार से भी सम्मानित किया था।
दिल का दौरा बना मौत की वजह
जानकारी के अनुसार, सीने में दर्द की शिकायत के बाद जसपाल राणा को दिल्ली के साकेत स्थित अस्पताल में भर्ती कराया गया था। जांच में उनकी धमनियों में रुकावट पाई गई, जिसके बाद उनका इलाज शुरू किया गया और स्टेंट भी लगाए गए। शुरुआती दिनों में उनकी हालत में सुधार की उम्मीद जताई जा रही थी, लेकिन बाद में स्वास्थ्य बिगड़ने से उनका निधन हो गया। उनके जाने से भारतीय निशानेबाजी ने न सिर्फ एक महान खिलाड़ी बल्कि एक ऐसे गुरु को भी खो दिया है, जिसने देश को कई चैंपियन दिए।
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Ms. Pooja, |
