घरेलू रसोई गैस के दामों में हाल ही में हुई 29 रुपये की बढ़ोतरी ने एक बार फिर आम आदमी की रसोई का बजट हिला दिया है। पिछले तीन महीनों के भीतर यह दूसरा मौका है जब देश में एलपीजी (LPG) सिलेंडर के दाम बढ़ाए गए हैं। इस बढ़ोतरी के बाद दिल्ली में अब एक घरेलू सिलेंडर की कीमत 913 रुपये से बढ़कर 942 रुपये पर पहुंच गई है। हर आम उपभोक्ता के मन में इस समय यही सवाल घूम रहा है कि आखिर अचानक गैस सिलेंडर की कीमतें इतनी क्यों बढ़ती जा रही हैं और क्या भविष्य में राहत मिलेगी या महंगाई का यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा? आइए एक्सपर्ट्स और सरकारी आंकड़ों के आधार पर इसकी असली वजहों और आगे की स्थिति को आसान भाषा में समझते हैं।
पश्चिम एशिया का संकट और सऊदी बेंचमार्क में रिकॉर्ड तेजी
भारत अपनी जरूरत का लगभग 60 फीसदी एलपीजी यानी रसोई गैस दूसरे देशों से आयात करता है। यही वजह है कि घरेलू बाजार में गैस की कीमतें सीधे तौर पर अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों से जुड़ी होती हैं। इस समय दाम बढ़ने के पीछे सबसे बड़ा कारण पश्चिम एशिया में जारी तनाव और युद्ध है। इसके चलते वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारी उथल-पुथल मची है। भारत में एलपीजी की दरें मुख्य रूप से ‘सऊदी कॉन्ट्रैक्ट प्राइस’ से तय होती हैं, जो कि इस ईंधन का ग्लोबल बेंचमार्क है। फरवरी में यह बेंचमार्क 542.5 डॉलर प्रति टन था जो अंतरराष्ट्रीय रूट ब्लॉक होने और सप्लाई घटने के कारण जून तक बढ़कर 790 डॉलर प्रति टन पर पहुंच चुका है। यानी कच्चे माल की कीमत में करीब 46% का भारी उछाल आया है, जिसका सीधा असर हमारी जेब पर पड़ रहा है।
हॉरमुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी और बढ़ा मालभाड़ा
युद्ध और तनाव के चलते खाड़ी देशों से आने वाले जहाजों के मुख्य रास्ते यानी हॉरमुज जलडमरूमध्य पर जहाजों की आवाजाही बेहद मुश्किल और जोखिम भरी हो गई है। इस संकट की वजह से भारत को काफी दूर के देशों से घूमकर गैस मंगवानी पड़ रही है। सुरक्षा कारणों से जहाजों का यह सफर 40 से 45 दिन लंबा हो गया है जिससे ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट और जहाजों का बीमा कई गुना बढ़ गया है। इस बढ़े हुए अतिरिक्त किराए का बोझ भी अंततः गैस की कुल लागत पर ही आ रहा है।
तेल कंपनियों पर ₹700 का भारी नुकसान और अंडर-रिकवरी का बोझ
केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्रालय के मुताबिक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कीमतें इतनी बढ़ चुकी हैं कि भारत में एक घरेलू सिलेंडर की वास्तविक सप्लाई लागत 1,600 रुपये से भी ऊपर जा चुकी है। लेकिन सरकार आम जनता को राहत देने के लिए इसे बाजार भाव पर नहीं बेचती। हालिया बढ़ोतरी के बाद भी सरकारी तेल कंपनियों को हर एक घरेलू सिलेंडर की बिक्री पर करीब 700 रुपये का घाटा उठाना पड़ रहा है। इस भारी घाटे की भरपाई के लिए तेल कंपनियां लगातार सरकार और बाजार पर कीमतें बढ़ाने का दबाव बना रही हैं।
क्या अब आगे और बढ़ेगा रेट और क्या हैं राहत के आसार
भविष्य में रसोई गैस के दाम कम होंगे या और बढ़ेंगे, यह पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करता है कि आने वाले हफ्तों में ग्लोबल हालात कैसे रहते हैं। जब तक पश्चिम एशिया का तनाव कम नहीं होता और समुद्री व्यापारिक रास्ते दोबारा सुरक्षित नहीं हो जाते, तब तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में एलपीजी की लागत ऊंची ही बनी रहेगी। चूंकि तेल कंपनियां अभी भी हर सिलेंडर पर ₹700 का भारी नुकसान खुद झेल रही हैं, इसलिए यदि वैश्विक कीमतें और बढ़ीं, तो आने वाले महीनों में 15 से 20 रुपये की एक और छोटी बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। हालांकि, सरकार लगातार नए देशों से गैस खरीदने की कोशिश कर रही है ताकि एक ही रूट पर निर्भरता कम की जा सके। जैसे ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में सऊदी बेंचमार्क नीचे आएगा, घरेलू बाजार में भी कीमतें वापस घटा दी जाएंगी।
उज्ज्वला लाभार्थियों के लिए राहत बरकरार
इस चौतरफा महंगाई के बीच सरकार ने एक मोर्चे पर राहत जरूर दी है। सरकार ने साफ किया है कि भले ही सामान्य उपभोक्ताओं के लिए दाम बढ़े हैं, लेकिन प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना’ के तहत आने वाले 10.58 करोड़ से ज्यादा परिवारों को मिलने वाली 300 रुपये की सब्सिडी जारी रहेगी। इस बढ़ोतरी के बाद जहां आम जनता को सिलेंडर 942 रुपये का मिलेगा वहीं उज्ज्वला लाभार्थियों को यह प्रभावी रूप से 642 रुपये का ही पड़ेगा जिससे गरीब परिवारों को इस महंगाई में थोड़ी राहत जरूर मिलेगी।
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