रोटरडैम अंतरराष्ट्रीय मैराथन में सावन बरवाल ने वह करिश्मा कर दिखाया, जिसका इंतजार भारतीय एथलेटिक्स को पिछले 48 सालों से था। सावन ने अंतत: सबसे पुराने भारतीय रिकॉर्ड को मात्र दो सेकंड से बेहतर करके 2 घंटे 11 मिनट 58 सेकंड समय में मैराथन दौड़ पूरी की और मात्र दो सेकंड के अंतर से शिवनाथ सिंह के रिकॉर्ड (02:12:00) तोड़कर रोटरडैम में 20वां स्थान प्राप्त किया।
देश-विदेश में जब कभी मैराथन की बात होती है तो शिवनाथ के रिकॉर्ड की चर्चा हमेशा से होती आई है। अब चूंकि अंतत: रिकॉर्ड बेहतर हुआ है इसलिए अब चर्चा का विषय सावन रहेगा। देखना यह होगा कि वह अपने रिकॉर्ड समय को कितना सुधार करता है। यह न भूलें कि उसने मात्र दो सेकंड से राष्ट्रीय रिकॉर्ड तोड़ा है और कुल प्रतिस्पर्धियों में 20वें स्थान पर रहा है। सीधा सा मतलब है कि मैराथन में हम शेष विश्व के धावकों से बहुत पीछे दौड़ रहे हैं। पुरुषों का वर्ल्ड रिकॉर्ड 2 घंटे 35 सेकंड का है। अर्थात भारतीय एथलीटों को अभी लंबा सफर तय करना है। लेकिन सवाल यह पैदा होता है कि जब हमारे एथलीट 48 साल में मात्र दो सेकंड बेहतर कर पाए हैं तो 11-12 मिनट के अंतर को कैसे और कब पाट पाएंगे? शायद सौ साल भी लग जाएं l यह हाल तब है जब देश में हर साल सैकड़ों मैराथन मुकाबले आयोजित किए जाते हैं। जहां तक नतीजों की बात है तो विदेशियों के सामने मेजबान एथलीट फिसड्डियों की कतार में दौड़ते दिखते हैं। तो फिर किसे फायदा हो रहा है?
पूर्व एथलीटों और जानकारों से पूछे तो उनके अनुसार, मैराथन आयोजन कमाई का धंधा बन गए हैं। बड़ी कंपनियां, आयोजक-प्रायोजक मिलीभगत करके देशवासियों को फिट रहने का खोखला मंत्र देकर लाख-करोड़ों लूट रहे हैं। भाग लेने वाले आम नागरिक घटिया दर्जे की टी-शर्ट, बैग पाने के लिए हजारों रुपये खर्च करते हैं। अर्थात देश में मैराथन को दिखावे और फर्जीवाड़े से बचाने की जरूरत है। उनसे जोकि मैराथन की आड़ में गोरखधंधा चला रहे हैँ l
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Rajender Sajwan, Senior, Sports Journalist |
