भले ही अंतरराष्ट्रीय मैराथन में भारतीय धावक कुछ भी उल्लेखनीय करते नजर नहीं आते हैं लेकिन डेढ़ अरब की आबादी वाले हमारे देश में मैराथन दौड़ों के आयोजन का चलन और संख्या में लगातार इजाफा हुआ है। ऐसे में सवाल यह पैदा होता है कि इन दौड़ों के आयोजन का औचित्य क्या है? क्या फिटनेस के लिए ऐसे आयोजन होते हैं या आयोजकों का उद्देश्य कुछ और होता है?? आयोजकों से पूछेंगे तो उनका जवाब होता है कि उनका मुख्य उद्देश्य देश के युवाओं को सड़क पर उतार कर उन्हें फिट रहने का संदेश देना है। सिर्फ युवा ही नहीं बल्कि बच्चे, बुजुर्ग, महिला-पुरुष और सैकड़ों-हजारों विदेशी धावक भी इन दौड़ों का आनंद उठाते हैं लेकिन मैराथन की मृग मरीचिका में भारतीय एथलीट कहां खड़े हैं? ओलम्पिक और विश्व स्तर पर कितने पदक जीतने में सफल रहे हैं?
बेशक, इन सवालों के जवाब आयोजकों, औद्योगिक घरानों, बड़ी कंपनियों और पेशेवर लोगों के पास नहीं है। शायद उन्हें यह भी याद दिलाने की जरूरत नहीं है कि देश के अब तक के श्रेष्ठ मैराथन धावक शिवनाथ सिंह का 48 साल पुराना राष्ट्रीय रिकॉर्ड उन्हें मुंह चिढ़ा रहा है। 1978 में शिवनाथ ने जालंधर में 2 घंटे 12 मिनट (02:12:00) में मैराथन दौड़ पूरी कर जो करिश्मा किया था उसे आज तक कोई भी भारतीय तोड़ नहीं पाया है। जहां तक महिलाओं की बात है तो 2015 में बीजिंग में हुई वर्ल्ड चैंपियनशिप के दौरान ओपी जैशा ने 2 घंटे 34 मिनट 43 सेकेंड (02:34:43) का समय निकालकर राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाया था। शिवनाथ का प्रदर्शन लंबे समय तक चलने वाला भारतीय रिकॉर्ड हैl बेशक़ यह प्रदर्शन भारत में मैराथन के छलावे को उजागर करता है l
यूं तो देश में रोज कोई न कोई दौड़ आयोजित की जाती है लेकिन नई दिल्ली मैराथन, टाटा मुम्बई मैराथन, पुणे इंटरनेशनल मैराथन, हैदराबाद मैराथन, एयर टेल, जयपुर मैराथन, कोलकाता मैराथन, लद्दाख मैराथन, ओरोविल मैराथन, ताजमहल मैराथन और दर्जनों अन्य फुल, हाफ और पांच दस किलोमीटर की दौड़ सालों से आयोजित की जा रही हैं। लेकिन भारतीय प्रदर्शन में कोई सुधार नजर नहीं आता। मैराथन संस्कृति तेजी से फैल रही है लेकिन प्रदर्शनों में सुधार कहीं दिखाई नहीं देता । तो फिर आयोजकों-प्रायोजकों का असली मकसद क्या है? जरा सोच विचार कर अपनी राय व्यक्त करें l
केन्या के केल्विन किप्टुम का विश्व रिकॉर्ड 2 घंटे 35 सेकेंड (02:00:35) और महिलाओं में इथोपिया की टिगिस्ट असेफा का रिकॉर्ड 2 घंटे 11 मिनट 53 सेकेंड (02:11:53) है जो कि लगातार सुधर रहा है। अर्थात् भारतीय धावक अभी सालों पीछे दौड़ रहे हैं। तो फिर ऐसी दौड़ किस काम की है?
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Rajender Sajwan, Senior, Sports Journalist |
