खेल पत्रकारिता दिवस पर विशेष: खेल पत्रकारिता का शर्मनाक दौर

world sports journalists day

विश्व खेल पत्रकारिता दिवस पर कुछ नामी खिलाड़ियों और खेल पत्रकारों क़े शुभकामना सन्देश पढ़ कर सुकून मिला और खेल पत्रकारिता क़े ज़िंदा रहने का अहसास भी हुआ लेकिन सच्चाई यह है कि आज भारतीय खेल पत्रकारिता अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है l ऐसा क्यों है और खेल पत्रकारिता क़े पतन क़े कारण क्या हो सकते हैं, इस बारे में गहन चिंतन मनन की जरुरत नहीं है l देश क़े जाने माने खेल पत्रकारों की मनः स्थिति और उनकी माली हालत को देखते हुए अनुमान लगाया जा सकता है कि कैसे देश क़े खेलों और खिलाड़ियों को सातवें आसमान पर चढ़ाने वाली पत्रकारिता पिछले दो दशकों में धड़ाम से गिरी और चूर चूर हो गई है l ऐसे में दो जुलाई का विश्व खेल पत्रकारिता दिवस महज दिखावा रह गया है l

यह सही है कि देश क़े खेलों क़े उत्थान पतन क़े साथ साथ पत्रकारिता भी उठती गिरती रही है l लेकिन एक दौर था जब विभिन्न खेलों में अंतर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय आयोजनों में सफलता हासिल करने वाले और रिकार्ड तोड़ प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियोंऔर उनके कोचों को देश भर क़े समाचार पत्र पत्रिकाओं में समुचित स्थान मिलता था l अनेक अवसरों पर यह भी देखा गया कि जब कोई खिलाड़ी या टीम शानदार प्रदर्शन करते थे तो उनकी खबर मुख्य पृष्ठ पर स्थान पाती थी l लेकिन आज आलम यह है कि राष्ट्रीय स्तर की बड़ी से बड़ी खबर को भी किसी अखबार में जगह नहीं मिल पाती l हाँ यदि खबर क्रिकेट की हो तो उसका वजन देखकर छाप दिया जाता है l

दोष क्रिकेट का नहीं है और खेल पत्रकारों को कोसना भी उचित नहीं होगा l कारण, तमाम अख़बारों में कुछ खास खेल ख़बरों को ही छापने क़े दिशा निर्देश हैँl हालांकि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतने वाले खेलों और खिलाड़ियों को छुट पुट पब्लिसिटी मिल जाती हैँ लेकिन क्रिकेट की स्थानीय खबर भी तमाम खेलों कि अंतर्राष्ट्रीय पर भारी पड़ती हैl आम धारणा क़े अनुसार दोष क्रिकेट का नहीं है क्योंकि क्रिकेट ने अपनी मेहनत से बाकी खेलों को बहुत पीछे छोड़ कर मीडिया का विश्वास जीत लिया हैँ l विभिन्न खेलों क़े पूर्व खिलाड़ी, कोच, प्रशासक और एक्सपर्ट भी मानते हैं कि खेल पत्रकारिता सिर्फ क्रिकेट पत्रकारिता बन कर रह गई हैl सोशल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया क़े एकाधिकार क़े चलते अखबारी खेल पूरी तरह गुम हो गए हैं और पूरे पेज क्रिकेट ने कब्ज़ा लिए हैं l यही कारण है कि भारतीय ओलम्पिक खेलों क़े पतन क़े लिए खेल पत्रकारों और उनकी पत्रकारिता को असली गुनहगार माना जा रहा है l ऐसे में विश्व खेल पत्रकारिता दिवस मनाने का कोई औचित्य भी नज़र नहीं आता l

Rajender Sajwan Rajender Sajwan,
Senior, Sports Journalist
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