दृष्टिविहीन चैम्पियनों से सौतेला व्यवहार क्यों?

blind champions

उस समय जबकि देश विश्व विजेता महिला खिलाड़ियों के स्वागत समारोहों और उन पर लाखों-करोड़ों लुटाने में व्यस्त था और पुरुष टीम के शर्मनाक प्रदर्शन का शोक मना रहा था, अचानक ब्लाइंड महिला खिलाड़ियों के विश्व विजेता बनने की खबर आती है। देश के क्रिकेट प्रेमी मीडिया ने खाना पूरी के लिए उनको भी खबर बनाया,भुनाया और जल्दी ही भुला भी दिया।

पहले ‘ब्लाइंड विमेंस टी-20 क्रिकेट वर्ल्ड कप’ में भारत, नेपाल, पाकिस्तान, ऑस्ट्रेलिया, श्रीलंका और अमेरिका सहित छह टीमों ने भाग लिया और कोलंबो में खेले गए फाइनल में भारत ने नेपाल को सात विकेट से हराकर खिताब जीत लिया। तारीफ की बात यह भी है कि हमारी लड़कियों ने कोई मैच नहीं हारा लेकिन हमारी दृष्टि बाधित महिलाएं देश के सिस्टम से जरूर हार रही हैं । इसलिए क्योंकि विजेता जैसा सम्मान तो मिल रहा है, नारे और भाषणबाजी हो रही है लेकिन उन पर धन वर्षा क्यों नहीं हो रही?

भले ही प्रधानमंत्री मोदी ने दोनों महिला टीमों से मुलाकात की, उन्हें देश की महिला शक्ति और आन-बान एवं शान से जोड़ा लेकिन बड़ा फर्क यह है कि दृष्टि बाधित टीम के हिस्से सिर्फ संबोधन, और वाह-वाही आए। खबर है कि प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें मिठाई भी खिलाई और यही शायद उनकी कमाई है, यही बड़ी खबर बनी है । दूसरी तरफ दो नवंबर को विश्व कप जीतने वाली महिलाएं करोड़ों में खेल रही हैं। बड़ी-बड़ी कंपनिया और औद्योगिक घराने उनके आगे नतमस्तक है, लोट-पोट हो रहे हैं। यूं तो दृष्टि बाधित खिलाड़ी भी सम्मान समारोह में व्यस्त हैं। लेकिन फर्क सिर्फ इतना है कि उनकी आड़ में कुछ अवसरवादी अपनी कमाई कर रहे हैं। सरकार, प्रदेश की सरकार और उनकी क्रिकेट को संचालित करने वाली जेबी संस्थाएं उनकी आड़ में कमा खा रही हैं l

विश्व विजेता महिला टीम को करोड़ों दिए जा रहे हैं। तत्काल बाद हुई डब्लूपीएल नीलामी में उन्हें फिर से करोड़ों में तौला गया लेकिन दृष्टि विहीन चैम्पियनों के साथ महज मजाक हो रहा है। शायद दक्षिण अफ्रीका के हाथों हुई शर्मनाक टेस्ट हार के बाद क्रिकेट की हांकने वालों के दिल दिमाग ने काम करना बंद कर दिया है।

Rajender Sajwan Rajender Sajwan,
Senior, Sports Journalist
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