कब कोई महिला ओलम्पिक गोल्ड जीतेगी?

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आज की भारतीय महिला अन्य देशों की महिलाओं के साथ बढ़-चढ़कर प्रतिस्पर्धा कर रही हैं, उनसे आगे निकल कर देश का नाम रोशन कर रही हैं। देश की प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति बन चुकी हैं और विज्ञान व तकनीक के दौर में अमेरिका, चीन, जापान और तमाम उन्नत देशों की महिलाओं को कड़ी टक्कर दे रही हैं। लेकिन खेलों में हमारी महिलाएं आज भी बड़ी उपलब्धियों से वंचित हैँ। ऐसा क्यों है?

इसमें कोई दो राय नहीं है कि कर्णम मल्लेश्वरी, साइना नेहवाल, पीवी सिंधु, साक्षी मलिक, मीराबाई चानू, लवलीना बोरगोहेन और मनु भाकर सहित कुल नौ महिलाओं ने देश के लिए ओलम्पिक पदक जीते हैं। पहला पदक (कांस्य) जीतने का गौरव वेटलिफ्टर कर्णम मल्लेश्वरी को प्राप्त है, जिसने 2000 के सिडनी ओलम्पिक में भारोत्तोलन में कांस्य पदक जीतकर भारतीय महिलाओं का खाता खोला था। शटलर पीवी सिंधु के नाम दो ओलम्पिक खेलों में पदक हैं तो मनु भाकर ने पेरिस ओलम्पिक में दो कांस्य पदक जीतने का रिकॉर्ड कायम किया लेकिन अब तक एक भी भारतीय महिला खिलाड़ी ओलम्पिक गोल्ड नहीं जीत पाई है। ऐसा क्यों है? कमी कहां रह जाती है?

भारतीय खेल इतिहास में!सबसे चर्चित महिला खिलाड़ी की बात करें तो पीटी उषा बड़ा नाम रही हैं। 1984 के लॉस एंजेलिस ओलम्पिक में भारतीय उड़न परी सेकेंड के सौवें हिस्से से पोडियम में चढ़ने से चूक गई थी। इसके बाद भारत को खाता खोलने में वर्षों लग गए। यह सही है कि उषा ओलम्पिक पदक नहीं जीत पाईं लेकिन एशियन गेम्स, एशियन चैंपियनशिप और विश्व स्तरीय मुकाबलों में उसका रिकॉर्ड किसी भी भारतीय महिला की तुलना में शानदार रहा है। उड़न परी फिलहाल भारतीय ओलम्पिक संघ (आईओए) के अध्यक्ष पद पर विराजमान है।

जहां तक पुरुषों की बात है तो हॉकी टीम ने आठ स्वर्ण जीते हैं और अभिनव बिंद्रा व नीरज चोपड़ा मात्र दो ओलम्पिक चैम्पियन हैं। लेकिन महिला खिलाड़ी कब ओलम्पिक गोल्ड जीतेगी, दुनिया के 150 करोड़ की आबादी वाला देश सौ साल से इंतजार कर रहा है। कला, विज्ञान, राजनीति और तमाम क्षेत्रों में पुरुषों को पछाड़ने वाली भारतीय महिला आखिर खेलों में क्यों पिछड़ी हैं? हो सकता है कि घर-परिवार, समाज और देश से मिलने वाले प्रोत्साहन व प्रमोशन में कहीं कोई बड़ी कमी है। यदि ऐसा है तो मामला गंभीर और विचारणीय है।

Rajender Sajwan Rajender Sajwan,
Senior, Sports Journalist
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