स्कूली खेल,टोटल फेल!

Amit Shah 31

स्कूल स्तर की चूक, गड़बड़ी या धोखाधड़ी किस प्रकार किसी छात्र खिलाड़ी का जीवन बर्बाद कर सकती है यह भारतीय खेलों के भुक्तभोगी बेहतर जानते हैं। क्षणिक लाभ के लिए ही सही माता-पिता और शिक्षक जब खिलाड़ियों की उम्र के साथ छेड़छाड़ करते हैं तो परिणाम देश को भुगतने पड़ते हैं, ऐसा देश के खेल जानकारों, विशेषज्ञों, पूर्व खिलाड़ियों और खेल अधिकारियों का मानना है। उनके अनुसार, भारतीय खेल इसलिए तरक्की नहीं कर पा रहे हैं, क्योंकि भारतीय खेलों को खुद माता-पिता, गुरु और कोच बर्बाद कर रहे हैं। वरना क्या कारण है कि आबादी में चीन को बहुत पीछे छोड़ चुका भारत अपने पड़ोसी से खेलों और तकनीक में लगातार पिछड़ता जा रहा है।

देश के कुछ सेवानिवृत्त और जानकार खेल प्रशासकों से बातचीत के बाद लेखक इस नजीते पर पहुंचा है कि भारतीय खेल उम्र की धोखाधड़ी में फंसकर रह गए हैं, जिसकी शुरुआत स्कूली खेलों से होती है। कुछ खेल प्रशासकों और कोचों के अनुसार, जैसे ही किसी स्कूल को खिलाड़ी की प्रतिभा का पता चलता है उसके कोच, प्रिंसिपल और अभिभावक उसकी उम्र घटाने के बारे में सोचने लगते है ताकि खिलाड़ी स्कूल और तत्पश्चात अपने राज्य के लिए अधिकाधिक योगदान दे सके, मेडल जीत सके। लगभग चार दशक तक स्कूली खेलों को कवर करने के अनुभव से पता चला है कि स्कूल खेल सारे फसाद की जड़ हैं जिनमें हर आयोजक राज्य अधिकाधिक पदक जीतने की नीयत से बड़ी उम्र के खिलाड़ी उतारता है। उनके फर्जी आयु प्रमाणपत्र बनाए जाते हैं और यह सिलसिला आजीवन चलता है। दूसरी तरफ सही उम्र के खिलाड़ी पिस जाते हैं और लाखों को खेल भी छोड़ना पड़ता है। नतीजा सामने है l सौ सालों तक ओलम्पिक भागीदारी के बावज़ूद व्यक्तिगत स्तर पर मात्र दो ओलम्पिक गोल्ड भारत के खाते में हैं।

देश के एक जाने-माने बैडमिंटन परिवार पर उम्र घटाने का मामला सामने आया है लेकिन सैकड़ों-हजारों परिवार, लाखों खिलाड़ी औऱ अधिकारी स्कूल स्तर के गोरखधंधे से जुड़े हैं। यह बीमारी भारतीय खेलों को खाए जा रही है, जिसकी चपेट में तमाम स्कूल हैं। हैरानी वाली बात यह है कि सरकारों का इस ओर जरा भी ध्यान नहीं है। बेहतर होगा कि ओलम्पिक आयोजन का ख्वाब देखन वाले नींद से जागें और पहले स्कूल स्तर पर ईमानदार प्रयास करें।

Rajender Sajwan Rajender Sajwan,
Senior, Sports Journalist
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