अक्सर यह सवाल बार बार पूछा जाता है कि डेढ़ सौ करोड़ की आबादी वाले दुनिया क़े सबसे बड़े लोकतंत्र क़े खेल पिद्दी पिद्दी देशों की तुलना में बहुत पीछे क्यों हैँ? क्यों खुद को जगत गुरु कहलाने वाले देश क़े खिलाड़ी, कोच और खेल प्रशासक कोई ठोस कदम नहीं उठा पाते और क्यों आगे बढ़ने की बजाए हमारे खेल उल्टी चाल चल रहे हैँ?
यदि खेल एक्सपर्टस और आंकड़ेबाजों से पूछेंगे तो उनके जवाब वही रटे रटाए होंगेl मसलन भ्र्ष्टाचार, बेईमानी, पक्षपात, टीम चयन में धांधली, नाकारा कोच, भ्रष्ट प्रशासक और सरकारी नकारापन खेलों को बर्बाद कर रहे हैँ l बेशक़, इन आरोपों में दम है l लेकिन भारतीय खेलों क़े पतन का सबसे बड़ा कारण खोजेंगे तो ग्रास रुट, स्कूल और कॉलेज स्तर की उदासीनता और धांधली क़े चलते दमदार खिलाड़ी आगे नहीं बढ़ पा रहे हैँ l एक दौर था जब देश क़े चैंपियन खिलाड़ी स्कूल और विश्वविद्यालयों से निकलकर राष्ट्रीय टीमों की ताकत बनते थे l हॉकी, फुटबाल, एथलेटिक, टेनिस, बैडमिंटन, कुश्ती, मुक्केबाजी और तमाम खेलों क़े नामी खिलाड़ियों की कर्म भूमि उनके शिक्षण संस्थान रहे l लेकिन भारतीय खेलों का बड़ा दुर्भाग्य यह है कि आज स्कूल- कॉलेज शिक्षा के साथ साथ खेलों को बढ़ावा देने में नाकाम हैँ l अब खेल अकादमियों ने ग्रासरूट पर सिखाने पढाने का बीड़ा उठा लिया है l खेल अकादमियाँ कैसे खेलों को बढ़ावा दे रही हैँ इनके बारे में कुछ पूर्व ओलंपियनों और कोचों की राय बहुत अच्छी नहीं है l उनके अनुसार जो कभी खिलाड़ी नहीं रहे तिकड़में लड़ा कर कोच बन बैठे हैँ और लाखों कमा रहे हैँ l उनके द्वारा तैयार खिलाड़ी स्कूल – कॉलेज में या तो पहुँच ही नहीं पाते या टीमों पर बोझ बन कर रह जाते हैँ l ऐसे में देश क़े खेल संघ और खेल प्राधिकरण को विदेशी कोचों का सहारा लेना पड़ता है l जिन पर लाखों करोड़ों खर्च करने पड़ते हैँ l फ़िरभी नतीजा वही ढाक क़े तीन पात l
हैरानी वाली बात यह है कि भारतीय खेल मंत्रालय, साई और सरकार क़े खेल सलाहकार बीमारी की असली जड़ को जानते हुए भी अनजान बने हुए हैँ l स्कूल – कालेज क़े खिलाड़ियों की अनदेखी कर उन्हें मुख्य धारा से काट दिया गया है l नतीजा सामने है l दुनिया क़े सबसे बड़े लोकतंत्र का कद खेलों में सबसे छोटा रह गया है l लेकिन नशाखोर खिलाड़ी तैयार करने में हम चैंपियन हैँ l
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Rajender Sajwan, Senior, Sports Journalist |
