फीफा अध्यक्ष गियनो इन्फेन्टिनो ने हाल हीं में एक साक्षात्कार में भारत को फुटबाल का ‘स्लीपिंग जायंट’ बता कर भारतीय फुटबाल के ठेकेदारों को राहत जरूर पहुंचाई होगी लेकिन क्या सचमुच ऐसा है? क्या भारतीय फुटबाल पर की गई टिप्पणी सटीक है या फीफा अध्यक्ष यूँ ही मज़ाक उड़ा रहे हैं? हालांकि इस प्रकार के डायलॉग भारतीय फुटबाल पिछले पचास साठ सालों से सुनती आ रही है लेकिन फिलहाल कहीं कोई बड़ा बदलाव नज़र नहीं आता l साल दर साल और दिन पर दिन भारतीय फुटबाल की हवा निकल रही है और बेकार ही हवा देने वाले अनाप शनाप बयान बाजी में लगे हैं l
पता नहीं फीफा अध्यक्ष ने क्यों कर भारतीय फुटबाल की शान में कसीदा पढ़ा है लेकिन वर्ल्ड रैकिंग में 141 वें रैकिंग वाले देश को सिर चढ़ाना न्याय संगत कदापि नहीं है l देश विदेश के फुटबाल जानकार एक्सपर्टस, खिलाड़ी और अधिकारी उनके तर्क को कदापि तर्क संगत नहीं मानते l इसलिए क्योंकि भारतीय फुटबाल में ऐसा कुछ नहीं बचा जिस पर डेढ़ सौ करोड़ आबादी वाला देश गर्व कर सके l सच तो यह है कि अड़ोस पड़ोस के पिद्दी से देश हमें पीट रहे हैं l एशियाई खेलों में भाग लेने का टिकट भीख में मिलता है तो ओलंपिक और वर्ल्ड कप में खेलने के सिर्फ सपने देख सकते हैं l कुल मिलाकर भारतीय फुटबाल के बारे में फीफा अध्यक्ष की राय भरोसे लायक नहीं है सच तो यह है कि भारत दुनिया के सबसे लोकप्रिय खेल में सबसे फिसड्डी बनकर रह गया है l
फुटबाल में इसलिए पीछे हैं क्योंकि देश में फुटबाल को संचालित करने वालों की नीयत में खोट है l यही कारण है कि आगे बढ़ने की बजाय हमारी फुटबाल उलटी चाल चल रही है l दो बार एशियाड में विजेता रहे और वर्ल्ड कप भी खेले लेकिन पिछले पांच छह दशकों में फुटबाल से खिलवाड़ हो रहा है l कोई भी ऐरा गैरा भारतीय फुटबाल से खेल जाता है l दास मुंशी से लेकर प्रफुल्ल पटेल और अब चौबे लाख कोशिशों के बाद भी फुटबाल की गाड़ी को पटरी पर नहीं ला पाए l ज़ाहिर है भारत फुटबाल का सोया शेर नहीं, बल्कि सियार है l फीफा अध्यक्ष की टिप्पणी के मायने समझने की जरुरत है l वह जानते हैं कि भले हीं भारत महाफिसड्डी है लेकिन फुटबाल के लिए बड़ा बाजार भी है, जहाँ फुटबाल खेली नहीं बेची जाती है l
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Rajender Sajwan, Senior, Sports Journalist |
