ना-पाक, हॉकी से बंदूक तक!

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पाकिस्तान अपनी नापाक हरकतों के कारण दुनियाभर में एक बदनाम आतंकवादी देश बनकर रह गया है, जिसका असर खेल रिश्तों पर भी पड़ा है। सिर्फ भारत के साथ ही नहीं अन्य कई देशों के साथ भी पाकिस्तान के खेल रिश्ते बिगड़ रहे हैं। पिछले कुछ सालों में भारत सहित अन्य कई देशों की हॉकी और क्रिकेट टीमों के पाकिस्तान दौरों पर लगभग विराम सा लग गया है। नतीजा सामने है। दोनों ही खेलों में पाकिस्तान फिसड्डी बनकर रह गया है। खासकर हॉकी में उसकी पहचान लगातार धूमिल हुई है।

पाकिस्तानी हॉकी प्रेमी, पूर्व खिलाड़ी और उसकी आतंकवादी सरकार कुछ भी सोचे लेकिन इस लेख के माध्यम से अपने भटके हुए पड़ोसी को याद दिलाना चाहते हैं कि कभी हॉकी में उसका भी बड़ा नाम था जो कि उसने अपने कुकर्मों से लगभग मिटा दिया है।

जिन भारतीय टीमों ने 1928, 32 और 36 में ओलम्पिक स्वर्ण पदक जीते थे, उनमें कई मुस्लिम खिलाड़ी हॉकी जादूगर ध्यानचंद और रूप सिंह के दौर में खेले, जिनमें से कुछेक विभाजन के बाद पाकिस्तान चले गए। 1948, 52 और 56 के ओलम्पिक तक भारत का दबदबा रहा लेकिन 1960 के रोम ओलम्पिक में पाकिस्तान ने पहली बार ओलम्पिक गोल्ड जीता। लेकिन 1984 के लॉस एंजिल्स ओलम्पिक में स्वर्णिम सफलता के बाद उसकी सफलता का ग्राफ भारत की तरह गिरता चला गया। हालांकि भारतीय हॉकी की वापसी हो चुकी है।

जहां तक भारत के महानतम हॉकी खिलाड़ियों की बात है तो ध्यानचंद, रूप सिंह, बलबीर सिंह सीनियर, केडी बाबू, अजीतपाल सिंह, मोहम्मद शाहिद, जफर इकबाल और दर्जनों अन्य ने भारतीय हॉकी को गौरवान्वित किया। इसी प्रकार पाकिस्तान के पास अख्तर रसूल, हनीफ खान, मंजूर अहमद, मंजूर हुसैन, सलीमुल्ला, तनवीर डार, शाहबाज अहमद, सोहैल अब्बास और कई अन्य ने पाकिस्तानी हॉकी को शीर्ष तक पहुंचाया। लेकिन आज आलम यह है कि उनका आतंकवादी देश हॉकी के शीर्ष से धड़ाम गिर चुका है।

Rajender Sajwan Rajender Sajwan,
Senior, Sports Journalist
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