ऑल इंग्लैंड चैम्पियन, राष्ट्रीय कोच और द्रोणाचार्य अवार्डी पुलेला गोपीचंद के हाल के एक बयान ने खेल मैदानों की तरफ दौड़ते भागते कदमों को फिलहाल रुकने और सोच समझकर आगे बढ़ने के लिए आगाह किया है। एक राष्ट्रीय दैनिक को दिए साक्षात्कार में गोपीचंद ने बिना सोचे समझे और अपनी आर्थिक स्थिति को जाने बगैर किसी भी खेल को अपनाने को नासमझी तो कहा है, साथ ही चेतावनी भी दी है कि खेल को अपनाना मिडिल क्लास के जीवन के साथ खिलवाड़ भी बन सकता है।
गोपीचंद के वक्तव्य के बारे में जब देश के अन्य पूर्व खिलाड़ियों, कोचों और खेल विशेषज्ञों की राय ली गई तो अधिकतर को लगता है कि देश की बैडमिंटन में ऊँचा मुकाम पाने के बावजूद भी यदि गोपी भावी पीढ़ी को सावधान कर रहे हैं तो उनकी भावना को समझने की जरूरत है। ज्यादातर का कहना है कि सरकारें भले ही खेलों को बढ़ावा देने का दिखावा करें, बड़ी-बड़ी योजनाओं का प्रलोभन दें लेकिन सच्चाई यह है कि एक फीसदी खिलाड़ी भी सफल नहीं हो पाते हैं। ऐसा इसलिए हैं, क्योंकि देश के खेल महासंघ, राज्य इकाइयां, भारतीय ओलम्पिक एसोसिएशन और खेल मंत्रालय द्वारा दी जाने वाली ज्यादातर सुविधाएं कुछ खास लोगों को मिल पाती है। लाखों खिलाड़ी सुविधाओं और साधनों के अभाव में बर्बाद हो रहे हैं और लम्बे खेल जीवन और मेहनत मशक्कत के बाद जब नींद से जागते हैं तो उनका सब कुछ लुट चुका होता है, माता-पिता का त्याग तपस्या बेकार जाते हैं।
गोपी के अनुसार, चंद क्रिकेट खिलाड़ी और कुछ एक अन्य खेलों से जुड़े खिलाड़ी ही सफल खेल जीवन जी पाते हैं। उनमें से 99 फीसदी का जीवन सरकारी बाबुओं और नकारा अधिकारियों को सलाम ठोकने में बीत जाता है। गोपी ने ठीक कहा है कि यदि देश को खेलों में बड़ा करना है, दुनिया में नाम कमाना है तो खिलाड़ियों को सुरक्षित जीवन देने और जीवन पर्यंत सुरक्षा देने की जरूरत है। गोपी ने उन अभिभावकों को सावधान किया है, जिनकी माली हालत ठीक नहीं है, क्योंकि अच्छे खिलाड़ी अमीर ही बन सकते हैँ.
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Rajender Sajwan, Senior, Sports Journalist |