मैच दर मैच अपमान के बोझ तले दब रही भारतीय फुटबाल के लिए महिला खिलाड़ी थोड़ी राहत, खुशी और उम्मीद लेकर आई हैं। एएफसी सीनियर, अंडर 20 और अंडर 17 महिला टीमों का महाद्वीप के प्रमुख देशों में स्थान पाना बताता है कि हर क्षेत्र की तरह हमारी बेटियां खेलों में और खासकर फुटबॉल जैसे पुरुष प्रधान खेल में ऊंची उड़ान भरने के लिए तैयार है तो पुरुष फुटबाल औधे मुंह गिर रही है l
फिलहाल पुरुष फुटबॉल का जिक्र करना जायका खराब करने जैसा है लेकिन यह तो कहा ही जा सकता है कि पुरुष फुटबॉल के कर्ता-धर्ता, टीम प्रबंधन, कोच और खिलाड़ी सभी सिर्फ और सिर्फ निंदा और लानत के पात्र हैं। उन्हें जितना भी कोसा जाय कम होगाl इसके विपरीत महिला खिलाड़ी, कोच, सपोर्ट स्टाफ और सबसे पहले देश के लिए खेलने वाली बालिकाओं के परिजन साधुवाद के पात्र हैं, जोकि भ्रष्ट, अवसरवादी और दुराचारियों से लड़-भिड़ कर अपनी बेटियों को मैदान में उतार रहे हैं।
जहां एक तरफ हमारी पुरुष फुटबॉल ने गिरावट, थू-थू और देश का नाम खराब करने की तमाम सीमाएं लांघी हैं तो बेटियों ने अपने अनुशासन, खेल कौशल और हार न मानने की जिद के साथ महाद्वीप के अग्रणी फुटबॉल राष्ट्रों में स्थान बनाया है। पुरुष टीमें तमाम आयु वर्गों में अपयश बटोर रही हैं तो महिलाओं की कामयाबी ने देश का नाम पूरी तरह खराब होने से बचाया है।
ऐसा पहले कभी नहीं हुआ जब तीन-तीन वर्गों में महिला टीम महाद्वीप के प्रमुख मंचों पर जा चढ़ी हों। बेशक़ गर्व की बात है लेकिन ज्यादा इतराने की जरूरत नहीं है। यह न भूलें कि पुरुष फुटबॉल की तुलना में महिलाओं की राह ज्यादा आसान है। इसलिए क्योंकि एशिया में बहुत कम देश महिला फुटबॉल के प्रति गंभीर हैं। खासकर, मुस्लिम महिलाओं के लिए आज भी उनके देशों में फुटबॉल खेलना बड़ी लड़ाई जीतने जैसा है। फिर भी महिला खिलाड़ियों को प्रोत्साहन देने का वक्त आ गया है। पुरुष खिलाड़ी और उनके ठेकेदारों को शर्म तो आनी चाहिए। साथ ही महिला टीम से जुड़े सभी लोगों से सबक भी सीखना चाहिए। लेकिन ऐसा रातों रात नहीं हुआ। महिला खिलाड़ियों ने कड़ी मेहनत की है। लेकिन सफर लम्बा है l पुरुष चाहें तो उनसे सीख सकते हैं।
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Rajender Sajwan, Senior, Sports Journalist |
