हाल ही में खेले गए एफआईएच रैंकिंग टूर्नामेंट ने भारतीय हॉकी को एक बार फिर से हैसियत का आईना देखने के लिए मजबूर किया है, क्योंकि पुरुष टीम आठवें और महिलाएं नौवें स्थान पर रहीं। पुरुष तो जैसे-तैसे बच गए लेकिन महिलाएं टॉप आठ से बाहर होकर एक बार फिर से फिसड्डियों में शामिल हो गई है। कमी कहां रही हॉकी जानकारों को पता चल गया होगा। लेकिन हॉकी की समझ रखने वाले एक वर्ग का मानना है कि टीम के चयन में धांधली, कुछ खास प्रदेशों के खिलाड़ियों का चयन, कोच के चयन में दखल और कई अन्य कारण खराब प्रदर्शन की वजह रहे हैं। हॉकी फेडरेशन के एक पूर्व अध्यक्ष और कई पूर्व खिलाड़ी तो यहां तक कह रहे हैं कि भारतीय हॉकी में कुछ भी ठीक नहीं चल रहा।
कुछ पूर्व खिलाड़ियों से बातचीत के बाद एक बड़ा कारण यह माना जा रहा है कि हॉकी फेडरेशन और अब हॉकी इंडिया ने जब से बड़े हॉकी आयोजनों को भुलाकर कुछ एक खास आयोजनों और राज्यों पर ध्यान दिया है तब से हॉकी गर्त में लुढ़क रही है। आगा खान कप, बेटन कप, नेहरू हॉकी टूर्नामेंट, सुरजीत हॉकी और दर्जनों अन्य टूर्नामेंट हॉकी इंडिया की प्राथमिकता से बाहर हो गए हैं। एक दौर वह था जब इन आयोजनों के प्रदर्शन के आधार पर भारतीय हॉकी टीमें गठित की जाती थीं। सभी आयोजनों में हजारों की संख्या में भीड़ जुटती थी लेकिन पिछले तीन दशकों से देश के प्रमुख टूर्नामेंट या तो ठप पड़े हैं या फिर खानापूरी भर रह गए हैं।
हाल ही में विश्व चैम्पियन भारतीय हॉकी टीम के स्टार खिलाड़ी असलम शेर खान ने औबेदुल्लाह खान गोल्ड की व्यथा सुनाते हुए कहा कि 1931 में भोपाल जन्मा यह टूर्नामेंट वापसी के लिए छटपटा रहा है। लेकिन आज मध्य प्रदेश सरकार दर्जनों चैम्पियन खिलाड़ियों को मंच प्रदान करने वाले टूर्नामेंट की वापसी में बाधा बनी हुई है। इसी प्रकार अन्य छोटे-बड़े आयोजन भी जैसे-तैसे चल रहे हैं। असलम ने तो बकायदा औबेदुल्लाह गोल्ड कप की वापसी के लिए अभियान छेड़ दिया है।
पुराने आयोजनों का बने रहना या वापसी इसलिए भी जरूरी है ताकि हॉकी प्रेमी देश के प्रिय खेले से जुड़े रहें। वर्ना हॉकी फिर से गुमनामी के अंधेरे की शिकार बन सकती है।
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Rajender Sajwan, Senior, Sports Journalist |
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