बचपन में एक कहानी पढ़ा -सुना करते थे कि कैसे एक सियार रंगरेज़ के बर्तन में गिरकर नीला हो गया था और फिर उसने कैसे इस अनोखे रंग रूप का फायदा उठाया l उसने जंगल के तमाम बड़े छोटे जानवरों पर रौब गाँठना शुरू कर दिया और बाकी जानवरों को कहता कि देवताओं ने उसे उन सब पर राज करने के लिए भेजा है और उन्हें अपने राजा और पैग़म्बर के सम्मान में सर झुकाना चाहिए lलेकिन जब एक दिन उसकी पोल खुली तो क्या हाल हुआ? देश के नौनिहाल को पता है l कुछ ऐसा ही हाल भारतीय फुटबाल का है जोकि वीरगाथाओं का चोला उतरने के बाद भी पंचतंत्र का सियार बनी हुई है l
बेशक़, कुछ फुटबाल प्रेमियों को यह सम्बोधन बुरा लगे लेकिन तमाम पराजयों, गिरावट की हद पार करने और लाखों करोड़ों देशवासियों का दिल तोड़ने वाली फुटबाल को जब हमारा भटका हुआ मीडिया और उसकी माई बाप फेडरेशन ‘ब्लू टाइगर्स’ बुलाती है तो फुटबाल के समर्पित प्रशंसकों का खून खौल जाता है l हार दर हार गिरावट की तमाम हदें पार करने वाली फुटबाल जब बांग्लादेश, भूटान, म्यांमार, थाईलैंड, इंडोनेशिया, अफगानिस्तान आदि फिसड्डी देशों से पिटती है तो पंचतंत्र का सियार दिल दिमाग पर छा जाता है l यही कारण है कि आम भारतीय फुटबाल प्रेमी ने देश की फुटबाल से नाता तोड़ लिया है और वह यूरोप, लेटिन अमेरिका और अफ्रीकी देशों की फुटबाल को देखने के लिए विवश है l
देश के जाने माने पूर्व खिलाड़ियों से जब उनकी बेरुखी के बारे में बात होती है तो उनका पहला सवाल यह होता है कि जो टीम और खिलाड़ी सिर्फ हारने के लिए खेलते हैं उन्हें ‘टाइगर’ कहना कहाँ तक ठीक है? कौन है जिसे टाइगर और सियार का फर्क तक पता नहीं है? लेकिन एआइएफएफ, उसके चाटुकार मीडिया और मंद बुद्धि फुटबाल प्रेमियों का एक वर्ग लगातार भारतीय फुटबाल के नकारापन को ढांपने में लगा है l कुछ पूर्व खिलाड़ियों के अनुसार ऐसे ही चाटुकारों के कारण भारतीय फुटबाल रसातल में गई है l याद करते हुए कहते हैं कि जब खेलनेके लिए जूते और ड्रेस नहीं थी और विदेश यात्राओं का खर्च निकालना भारी था तब भारतीय फुटबाल ने ऊँचा नाम सम्मान कमाया l लेकिन आज निचले दर्जे के खिलाड़ी लाखों करोड़ों कमा रहे हैं और देश के लिए अपयश बटोर रहे हैं l ऐसे खिलाड़ियों, उनको बढ़ावा देने वाले मीडिया और फेडरेशन के नाकारा अधिकारीयों को टाइगर कहें या सियार? पूछता है भारत!
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Rajender Sajwan, Senior, Sports Journalist |
