हॉकी के 100 साल: जो कमाया था, लुट गया!

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भारतीय हॉकी अपनी स्थापना के सौ साल पूरे करने जा रही है और हॉकी इंडिया इस ऐतिहासिक अवसर को पूरी तरह से भुनाना चाहता है। बेशक, किसी भी संस्थान और खेल संस्था के जीवन में उसके सौ सालों का खास महत्व है लेकिन इन सालों में भारतीय हॉकी ने कितना पाया और क्या खोया, जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं पर भी ध्यान देने की जरूरत है।

जहां तक सौ सालों की उपलब्धियों की बात है तो आठ ओलम्पिक गोल्ड और एकमात्र विश्व कप जीत उस हॉकी की कमाई रही है, जिसे हम आज तक राष्ट्रीय खेल का जामा नहीं पहना पाए। हमें उस हॉकी पर नाज है, जिसके इतिहास पुरुष को यह भारत महान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित नहीं कर पाया। तो फिर शताब्दी वर्ष मनाने का औचित्य क्या है? आज भारतीय हॉकी कहां है? किस हाल में है? और क्यों है? जैसे सवाल पूछने की फुर्सत शायद किसी को नहीं है। लेकिन भारतीय हॉकी अर्श से फर्श पर क्यों गिरी? इस बारे में सोच-विचार की जरूरत तो है। शायद इसी लिए शताब्दी वर्ष मनाने का स्वांग रचने की जरूरत आन पड़ी है। लेकिन किसी को भी यह जानने की फुर्सत नहीं कि जिस हॉकी ने हिटलर के सामने भारत का साक्षात्कार कराया था वह आज आठवें नंबर का देश है।

रिकॉर्ड की बात करें तो 7 नवंबर 1925 को भारतीय हॉकी फेडरेशन (आईएचएफ) का गठन हुआ था, जिसके लिए अंग्रेजों का धन्यवाद करने की जरूरत है। गुलाम भारत उनके राज में 1928, 32 और 36 में ओलम्पिक चैम्पियन बना और कुल मिला कर आठ ओलम्पिक स्वर्ण जीतने में सफलता मिली, जिनमें से 1980 के मॉस्को ओलम्पिक का स्वर्ण पदक आधा-अधूरा ही कहा जाएगा। विश्व विजेता तो सिर्फ 1975 में ही बन पाए।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि भारतीय हॉकी ने मेजर ध्यानचंद, रूप सिंह, केडी बाबू, जेंटल, बलबीर सीनियर, शंकर लक्ष्मण, क्लाडियस, गुरुबक्श सिंह, हरबिंदर सिंह, अजितपाल सिंह, पृथीपाल सिंह, अशोक ध्यानचंद, मोहम्मद शाहिद और दर्जनों अन्य महान खिलाड़ी पैदा किए लेकिन भारत हॉकी में आज कहा है और हम चैम्पियन खिलाड़ी क्यों तैयार नहीं कर पा रहे हैं? सौ साल बाद इस सवाल का जवाब खोजा जाना ज्यादा जरूरी है। सभा-समारोह, ढोंग और हॉकी के पैसे की बर्बादी से हम कदापि महान नहीं बना पाएंगे। आज आलम यह है कि कोई भी हिटलर भारतीय हॉकी और ध्यानचंद की बात नहीं करने वाला। आज आलम यह है कि ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी और हॉलैंड जैसे देशों को भारतीय हॉकी से डर नहीं लगता तो बेल्जियम, इंग्लैंड और स्पेन भी आगे बढ़ चले हैं। तो फिर आठवें नंबर का हॉकी राष्ट्र सौ साल पूरे करने पर काहे इतरा रहा है ? देखते हैं कि हमारे हॉकी आका आने वाले दिनों में कैसा पागलपन दिखाते हैं!

Rajender Sajwan Rajender Sajwan,
Senior, Sports Journalist
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