दुनियां क़े अधिकांश बड़े छोटे, घनी आबादी वाले या कुछ एक लाख की जनसंख्या वाले देशों का कोई ना कोई राष्ट्रीय खेल जरूर है l लेकिन आबादी क़े मामले में 150 करोड़ क़े नज़दीक पहुँच चुका भारत महान आजादी क़े 78 साल बाद भी अपने किसी खेल को राष्ट्रीय खेल का दर्ज़ा नहीं दे पाया है, जोकि खेलों क़े प्रति भारत के रुझान, लगाव, समर्पण और गंभीरता को दर्शाता है l ओलम्पिक आयोजन क़े लिए ज़ी तोड़ मेहनत करने वाले देश क़े खेल आकाओं से जब कभी इस बारे में पूछा जाता है तो तपाक से बोल देते हैं, ‘हॉकी है ना’ l लेकिन सच्चाई यह है कि हॉकी हमारा राष्ट्रीय खेल नहीं है l
तो फिर हमारा राष्ट्रीय खेल कौनसा है? यदि 1970-80 क़े दशक बाद क़े किसी भारतीय से पूछेंगे तो वह सीधे सीधे क्रिकेट को देश का राष्ट्रीय खेल बताएगा, क्योंकि यही वह समय था जब भारतीय हॉकी का जलवा मध्यम पड़ लगा था और जब भारतीय क्रिकेट ने 1983 में विश्व कप जीता तो क्रिकेट ने हॉकी को पूरी तरह दूर तक धकिया दिया था l इसके साथ ही क्रिकेट आम भारतीय गरीब, अमीर, छोटे, बड़े का खेल बन गया l दूसरी तरफ हॉकी ने दिन पर दिन, ओलम्पिक दर ओलम्पिक अपयश कमानl जारी रखा l हालांकि कई सालों तक भारतीय हॉकी आठ ओलम्पिक स्वर्ण की कमाई खाती रही लेकिन देश की सरकार, खेल मंत्रालय, हॉकी फेडरेशन और खिलाड़ियों ने कभी भी हॉकी को राष्ट्रीय खेल बनाने की वकालात नहीं की l तत्पश्चात स्वयं खेल मंत्रालय को एक आरटीआई क़े जवाब में बताना पड़ा कि हॉकी हमारा राष्ट्रीय खेल नहीं है l
वर्षों तक हॉकी ओलम्पियन और हॉकी प्रेमी अपने खेल को राष्ट्रीय खेल का दर्जा देने की मांग करते रहे लेकिन देश की सरकार क़े कान में जूँ नहीं रेंगी l लेकिन सूत्रों से पता चला है कि सरकार पर देश का राष्ट्रीय खेल घोषित करने का दबाव बढ़ रहा है l कुछ एक संस्थान और असरदार लोग क्रिकेट को यह सम्मान दिलाने क़े लिए ज़ी जान से जूटे हैं और शायद उन्हें कामयानी मिल भी जाए l ठीक उसी प्रकार जैसे कि हॉकी जादूगर मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न दिलाने क़े लिए अभियान छेड़ा गया, आंदोलन हुए लेकिन यह सम्मान क्रिकेट क़े महान खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर को मिल गया l
हॉकी क़े अलावा यदि किसी अन्य ओलम्पिक खेल में भारत को स्वर्णिम सफलता मिली है तो निसंदेह निशानेबाजी में अभिनव बिंद्रा और जेवलिन थ्रोवर नीरज चोपड़ा हैं l अन्य खेलों का कद भी फिलहाल हॉकी या क्रिकेट जैसा नहीं है l लेकिन हॉकी को ओलम्पिक स्वर्ण जीते 45 साल हो चुके हैं और इस बीच क्रिकेट लम्बी – ऊँची छलांग लगाते हुए ओलम्पिक तक जा पहुंचा है और 2028 क़े ओलम्पिक में बाकायदा शामिल हो गया है l शायद यही कारण है कि राष्ट्रीय खेल का रिक्त स्थान भरने का प्रबल दावेदार भी क्रिकेट को माना जा रहा है l
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Rajender Sajwan, Senior, Sports Journalist |
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