एशिया का पहला और फुटबॉल जगत का तीसरा सबसे पुराना फुटबॉल टूर्नामेंट डूरंड कप इस बार रिकॉर्ड पांच आयोजन स्थलों – पश्चिम बंगाल, झारखंड, असम, मेघालय और मणिपुर में आयोजित किया जा रहा है और सभी राज्यों में फुटबॉल प्रोत्साहन के लिए दर्शनीय माहौल देखने को मिल रहा है।
सालों पहले डूरंड कप और डीसीएम फुटबॉल टूर्नामेंट दिल्ली के डॉ. बीआर अम्बेडकर स्टेडियम में खेले जाते रहे। देश की नामी टीमों और उभरते खिलाड़ियों का जलवा देखने के लिए हजारों की भीड़ दर्शक दीर्घाओं में मौजूद रहती थी। फुटबॉल का रोमांच सिर चढ़कर बोलता था, जिसके चलते अनेकों बार हिंसा भी हुई। लेकिन आज ना सिर्फ दिल्ली का अम्बेडकर स्टेडियम खामोश है, तमाम राज्यों में भी फुटबॉल के मैच देखने वालों की संख्या उंगलियों पर गिनी जा सकती है। यह नौबत इसलिए आई है, क्योंकि डूरंड, डीसीएम, आईएफए शील्ड और अन्य नामी आयोजनों में भाग लेने वाली टीमों और खिलाड़ियों का स्तर गिरता चला गया। लेकिन सबसे बड़ा कारण भारतीय राष्ट्रीय टीम के खिलाड़ियों का कामजोर प्रदर्शन है। नतीजन देश भर में फुटबॉल उपेक्षित खेल बन कर रह गया है l
हालांकि डूरंड कप और डी सी एम जैसे आयोजनों में कई विदेशी टीमें भी भाग लेने आती थीं लेकिन भारतीय खिलाड़ियों से सजी मोहन बागान, ईस्ट बंगाल, मोहम्मडन स्पोर्टिंग, गोरखा ब्रिगेड, सलगांवकर, मफतलाल, पंजाब पुलिस, केरल पुलिस, जेसीटी, राजस्थान पुलिस, महेंद्रा एंड महेंद्रा और दर्जनों अन्य टीमों ने भारतीय फुटबाल को लोकप्रिय बनाया। यहीं से निकलकर अनेक खिलाड़ी राष्ट्रीय टीम का हिस्सा बने। लगातार पिछड़ रही भारतीय फुटबॉल के लिए इस बार का डूरंड कप यह संदेश लेकर आया है कि तमाम घरेलू आयोजनों को सजाने-संवारने की जरूरत है। बेहतर मेजबानी से फुटबॉल प्रेमियों की फिर से वापसी संभव है। खासकर, उभरते खिलाड़ी अपने आयोजनों से ऊब कर यूरोप और लैटिन अमेरिकी फुटबॉल की तरफ अंधी दौड़ लगाने लगे हैं। उन्हें अपनी फुटबाल से जोड़ने की जरुरत है l लेकिन सबसे बड़ी भूमिका ऑल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन (एआईएफएफ) को निभानी होगी, जो कि भ्रष्टाचार और आपसी कलह में डूब कर देश की फुटबॉल को बर्बाद कर चुकी है। सालों बाद देसी कोच को दायित्व सौंपा गया है। ऐसे में घरेलू आयोजनों का सुधार पहली वरीयता होनी चाहिए।
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Rajender Sajwan, Senior, Sports Journalist |
