अमेरिकी ओपन के पहले ही राउंड में मिली हार के बाद रोहन बोपन्ना संन्यास लेने के बारे में सोचने लगे हैं। हालांकि सिंगल्स में उनका अभियान पहले ही थम गया था लेकिन अब डबल्स में भी बस करने के बारे में पक्का मन बना चुके हैं। बेशक, 45 साल की उम्र में टेनिस जैसे दमखम वाले खेल में डटे रहना आसान नहीं है। ऐसे में बोपन्ना के सामने एक ही विकल्प बचता है और वह है टेनिस रैकेट खूंटे में पर टांगना। इसके साथ ही भारतीय टेनिस फिर से वहां पहुंच जाएगी, जहां से शुरू किया था। अर्थात एक बार फिर एबीसी या जीरो से शुरू करना पड़ेगा।
भले ही भारतीय टेनिस का भला चाहने वालों और दिल से खेल को प्यार करने वालों को बुरा जरूर लगेगा लेकिन देश की पहचान और टेनिस की गिरी पड़ी साख को संवारने वाला एक भी खिलाड़ी नजर नहीं आ रहा। ऐसा क्यों हैं? क्यों फुटबॉल के बाद दूसरे लोकप्रिय खेल में भारत का कद घटता जा रहा है? क्यों हमारा कोई खिलाड़ी आज तक कोई ग्रैंड स्लैम नहीं जीत पाया? पूर्व खिलाड़ियों और खेल को मान-सम्मान दिलाने वाले भारतीय खिलाड़ियों से पूछेंगे तो शायद उनका जवाब होगा कि टेनिस को प्रोत्साहन देने के लिए हमारे पास अच्छे कोच, सपोर्ट स्टाफ, विश्व स्तरीय कोर्ट और सबसे अहम ईमानदार अधिकारियों की भारी कमी है। कुछ साल पहले तक भारतीय टेनिस पर कब्जा जमाए बैठे एक परिवार को कोसा जाता था जिसकी तीसरी-चौथी पीढ़ी राजे-नवाबों की तरह खेल को अपनी बपौती बनाए बैठी है। लेकिन देश के खेल मंत्रालय और भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) शायद सोये हुए हैं l उन्हें भी गुनाहगारों में घसीटा जाना चाहिए, जिन्होंने अमीरों के कहे जाने वाले खेल को आर्थिक मजबूती तो दी लेकिन रिजल्ट के बारे में कभी कोई सवाल नहीं पूछा।
भला हो रामानाथन कृष्णन, विजय अमृतराज, रमेश कृष्णन, आनंद अमृतराज, लिएंडर पेस, महेश भूपति और सानिया मिर्जा का, जिनकी उपलब्धियों ने भारतीय पहचान को पूरी तरह मरने नहीं दिया। हालांकि आज तक एक भी भारतीय टेनिस का ग्रैंड स्लैम (सिंगल्स) और ओलम्पिक गोल्ड नहीं जीत पाया।l फ़िरभी अमृतराज और कृष्णन परिवारों के अलावा लिएंडर पेस और महेश भूपति की डबल्स उपलब्धियां काबिले तारीफ हैं। लेकिन उनके बाद कोई नहीं। फिलहाल, यही सब दिखाई दे रहा है।
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Rajender Sajwan, Senior, Sports Journalist |
