New Delhi: सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर का पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग वाली याचिका पर गुरुवार को केंद्र सरकार से जवाब मांगा। मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई ने सुनवाई के दौरान कहा कि “जमीनी हकीकत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता,” और हाल ही में हुई पहलगाम घटना का जिक्र किया। वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने मामले की जल्द सुनवाई की मांग की, जिस पर पीठ ने यह टिप्पणी की। पीठ में न्यायमूर्ति के. विनोद भी शामिल रहे।
केंद्र की आपत्ति और पिछली कार्यवाही का हवाला
केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने याचिका खारिज करने की मांग की, यह कहते हुए कि पहले भी अदालत ने ऐसी याचिकाओं पर जुर्माना लगाया है। उन्होंने तर्क दिया कि चुनाव हो चुके हैं और जम्मू-कश्मीर की विशेष परिस्थितियों को ध्यान में रखकर निर्णय लिया जाना चाहिए। कोर्ट ने शिक्षाविद् जहूर अहमद भट और सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता अहमद मलिक की याचिका को आठ सप्ताह बाद सूचीबद्ध करने का आदेश दिया।
याचिकाकर्ताओं का तर्क और कोर्ट में बहस
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि अनुच्छेद 370 को निरस्त करने पर आए संविधान पीठ के फैसले को 21 महीने बीत चुके हैं, और अदालत के भरोसे पर केंद्र ने राज्य का दर्जा बहाल करने का आश्वासन दिया था, लेकिन अभी तक कोई प्रगति नहीं हुई। उनका आरोप है कि अदालत ने इस मुद्दे पर विचार नहीं किया था क्योंकि केंद्र ने भरोसा दिलाया था कि राज्य का दर्जा जल्द बहाल किया जाएगा, हालांकि कोई समय सीमा तय नहीं की गई थी।
सरकार का जवाब और अगली सुनवाई
सॉलिसिटर जनरल ने जवाब में कहा कि जैसे सरकार ने चुनाव कराने का वादा पूरा किया, वैसे ही राज्य का दर्जा भी उचित समय पर बहाल किया जाएगा। उन्होंने सवाल उठाया कि यह याचिका ऐसे समय पर क्यों दायर की गई है जब सुरक्षा स्थिति तनावपूर्ण है। इस पर CJI ने कहा कि पहलगाम हमले के बाद की परिस्थितियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई आठ हफ्ते बाद तय की है। वहीं, कांग्रेस सहित कई राजनीतिक दल भी इस याचिका का हिस्सा हैं और राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग को लेकर आंदोलन चला रहे हैं।
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Ms. Pooja, |
