New Delhi: नेपाल में हाल ही में हुए Gen-Z विरोध प्रदर्शनों पर कार्रवाई करते हुए गठित न्यायिक आयोग ने बड़ा कदम सुझाया है। आयोग ने रविवार को अपदस्थ प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली, पूर्व गृह मंत्री रमेश लेखक समेत पांच शीर्ष नेताओं और अधिकारियों के पासपोर्ट जब्त करने की सिफारिश की। आयोग का कहना है कि जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती, इन लोगों को बिना अनुमति काठमांडू छोड़ने की इजाज़त नहीं होगी। यह कदम जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है।
पुलिस फायरिंग में 75 प्रदर्शनकारियों की मौत
8 सितंबर को हुए Gen-Z विरोध प्रदर्शनों के पहले दिन पुलिस फायरिंग में कम से कम 19 प्रदर्शनकारी मारे गए थे। दो दिनों तक चले प्रदर्शनों में कुल मृतकों की संख्या बढ़कर 75 तक पहुंच गई। भ्रष्टाचार और सोशल मीडिया पर प्रतिबंध के मुद्दे पर भड़के इस आंदोलन ने देशभर में गहरी राजनीतिक हलचल मचा दी थी। हिंसा की तीव्रता के चलते अगले ही दिन ओली को प्रधानमंत्री पद से हटा दिया गया। इसके बाद अंतरिम प्रधानमंत्री सुशीला कार्की की कैबिनेट ने 21 सितंबर को न्यायिक जांच आयोग का गठन किया।
वरिष्ठ अधिकारियों पर भी गिरी गाज
जांच आयोग ने ओली और लेखक के अलावा तीन शीर्ष अधिकारियों पर भी कार्रवाई की सिफारिश की है। इनमें पूर्व गृह सचिव गोकर्ण मणि दुवादी, राष्ट्रीय जांच विभाग के पूर्व प्रमुख हुतराज थापा और काठमांडू के पूर्व मुख्य ज़िला अधिकारी छवि रिजाल शामिल हैं। आयोग का कहना है कि इन अधिकारियों की भूमिका की गहन जांच जरूरी है ताकि दोषियों की जवाबदेही तय हो सके।
ओली ने खुद को बताया निर्दोष
उधर, ओली ने आरोपों से इंकार किया है। उन्होंने हाल ही में पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि उन्होंने कभी प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने का आदेश नहीं दिया। ओली का कहना है कि भीड़ पर स्वचालित हथियारों से फायरिंग हुई, जो पुलिस के पास उपलब्ध नहीं थे। उन्होंने इस घटना की स्वतंत्र जांच की मांग भी की है। वहीं, नेपाल के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने ओली सरकार को प्रदर्शनकारियों पर अत्यधिक बल प्रयोग का दोषी ठहराया और कहा कि सरकार आंदोलन की गंभीरता का आकलन करने में विफल रही।
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