‘जैसे ही OBC आता है, सिंहासन हिलने लगता है’: UGC विवाद पर योगेंद्र यादव का बड़ा बयान

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UGC (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) के नए नियमों को लेकर देशभर में चल रहे विवाद के बीच योगेंद्र यादव का एक बयान चर्चा में आ गया है। एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने कहा कि “जैसे ही ओबीसी वर्ग का कोई व्यक्ति आगे आता है, सत्ता के सिंहासन हिलने लगते हैं।” उनके इस बयान ने शिक्षा व्यवस्था, सामाजिक न्याय और सत्ता संरचना को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

UGC विवाद पर क्या बोले योगेंद्र यादव

योगेंद्र यादव ने इंटरव्यू में कहा कि UGC के हालिया फैसले केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं हैं, बल्कि इनके पीछे सामाजिक प्रतिनिधित्व को सीमित करने की सोच भी दिखाई देती है। उनके मुताबिक, जब भी विश्वविद्यालयों या शैक्षणिक संस्थानों में OBC, दलित या वंचित वर्गों की भागीदारी बढ़ती है, तब व्यवस्था में बैठे लोगों को असहजता महसूस होने लगती है।

‘यह सिर्फ योग्यता का मुद्दा नहीं’

उन्होंने साफ कहा कि इस पूरे विवाद को सिर्फ “योग्यता बनाम आरक्षण” के चश्मे से देखना गलत है। योगेंद्र यादव के अनुसार, “अगर योग्यता ही एकमात्र मापदंड होती, तो सदियों से कुछ वर्गों का ही वर्चस्व नहीं रहता।” उन्होंने सवाल उठाया कि क्या आज भी अवसरों तक सबकी पहुंच समान है?

शिक्षा व्यवस्था में असमानता का आरोप

योगेंद्र यादव ने दावा किया कि उच्च शिक्षा संस्थानों में अब भी:

वंचित वर्गों की पर्याप्त भागीदारी नहीं है

फैसले लेने वाली संस्थाओं में एक खास वर्ग का दबदबा बना हुआ है

नीतियों के ज़रिए धीरे-धीरे सामाजिक न्याय को कमजोर किया जा रहा है

उनका कहना था कि UGC के नए नियम इसी प्रवृत्ति को आगे बढ़ाते नजर आते हैं।

सरकार और समर्थकों पर निशाना

इंटरव्यू में उन्होंने सरकार समर्थकों पर भी निशाना साधते हुए कहा कि जब भी इस तरह के सवाल उठते हैं, तो उन्हें राजनीतिक करार देकर खारिज करने की कोशिश की जाती है। योगेंद्र यादव के मुताबिक, असली मुद्दा यह है कि क्या भारत की शिक्षा व्यवस्था सभी वर्गों को समान अवसर दे रही है या नहीं।

छात्रों और शिक्षकों से अपील

योगेंद्र यादव ने छात्रों और शिक्षकों से अपील की कि वे इस मुद्दे को सिर्फ नियमों तक सीमित न रखें, बल्कि इसके दूरगामी सामाजिक असर को समझें और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखें।

UGC विवाद पर योगेंद्र यादव का यह बयान एक बार फिर आरक्षण, सामाजिक प्रतिनिधित्व और सत्ता संतुलन की बहस को केंद्र में ले आया है। उनका साफ संदेश है कि शिक्षा व्यवस्था में समानता की बात तब तक अधूरी है, जब तक वंचित वर्गों की हिस्सेदारी को पूरी ईमानदारी से स्वीकार नहीं किया जाता।

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