Supreme Court of India की 9-न्यायाधीशों की संविधान पीठ 7 अप्रैल से सबरीमला संदर्भ (रेफरेंस) मामले पर सुनवाई शुरू करेगी। यह मामला आस्था, धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के अधिकार जैसे अहम संवैधानिक सवालों से जुड़ा है, इसलिए इसे बड़ी पीठ के पास भेजा गया है।
क्या है सबरीमला विवाद?
विवाद Sabarimala Temple में 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के प्रवेश पर पारंपरिक प्रतिबंध को लेकर है। वर्ष 2018 में सुप्रीम कोर्ट की 5-न्यायाधीशों की पीठ ने बहुमत से फैसला देते हुए महिलाओं के प्रवेश पर रोक को असंवैधानिक करार दिया था। इसके बाद इस फैसले के खिलाफ कई पुनर्विचार याचिकाएं दायर हुईं।
9-न्यायाधीशों की पीठ क्यों?
बाद में अदालत ने कुछ व्यापक संवैधानिक प्रश्न—जैसे कि
धार्मिक संप्रदायों के अधिकार (अनुच्छेद 26),
समानता और गैर-भेदभाव (अनुच्छेद 14-15),
व्यक्तिगत आस्था बनाम सार्वजनिक व्यवस्था—
इन पर स्पष्टता के लिए मामले को बड़ी पीठ के पास भेज दिया। 9-न्यायाधीशों की यह पीठ इन्हीं सिद्धांतगत मुद्दों पर विचार करेगी।
सुनवाई का दायरा
यह सुनवाई केवल सबरीमला तक सीमित नहीं रहेगी। अदालत यह भी तय करेगी कि:
क्या अदालतें धार्मिक प्रथाओं की “आवश्यकता” (essential religious practices) की जांच कर सकती हैं?
समानता के अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता में टकराव की स्थिति में संतुलन कैसे बनाया जाए?
क्यों है अहम?
यह मामला केवल एक मंदिर तक सीमित नहीं, बल्कि देश में धार्मिक स्वतंत्रता और लैंगिक समानता के व्यापक विमर्श से जुड़ा है। 9-न्यायाधीशों की पीठ का फैसला भविष्य में ऐसे मामलों के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत तय कर सकता है।
7 अप्रैल से शुरू होने वाली यह सुनवाई संवैधानिक कानून के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय यह स्पष्ट करेगा कि धार्मिक परंपराओं और मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन किस तरह स्थापित किया जाए।
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